प्रोफेशनल ट्रेडरों की जीविका ही नहीं, सारा ऐशो-आराम शेयर बाज़ार पर टिका है। वे बाज़ार के बढ़ने पर कमाते हैं और गिरने पर भी। अनिश्चितता को नाथना उन्हें बखूबी आता है। बाज़ार बढ़ता ही जा रहा है तो वे स्टॉक्स और सूचकांकों में लॉन्ग यानी खरीदने के सौदों से कमाते हैं। लेकिन इस वक्त दुनिया के साथ-साथ भारत में भी आशंका गहराती जा रही है कि शेयर बाज़ार का बुलबुला कभी भी फट सकता है। ऐसा हुआऔरऔर भी

सालोंसाल से कहा जाता रहा है कि शेयर बाज़ार का उन्माद जब चरम पर रहता है, तब रिटेल निवेशकों की एंट्री होती है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। टेक्नोलॉज़ी व डिजिटल मीडिया के प्रसार ने रिटेल निवेशकों की वित्तीय साक्षरता व पहल बढ़ा दी है। ऊपर से कोरोनाकाल में ‘वर्क फ्रॉम होम’ के चलते मिली फुरसत ने नौकरी कर रही युवा पीढ़ी को समझदार निवेशक बना दिया। एक सर्वे के मुताबिक बीते सवा साल में ब्रोकरोंऔरऔर भी

कोई सिर उठाए शेयर बाज़ार में टिप्स या इंट्यूशन के दम पर ट्रेड करने आ जाए तो वह जेब खाली करके ही लौटेगा। यहां तो वही रिटेल ट्रेडर कामयाब होते हैं जो प्रोफेशनल की तरह ट्रेड करते हैं अपना सिस्टम बनाकर। यह सिस्टम किसी की नकल नहीं होता। टेक्निकल एनालिसिस का आधार। अधिकतम चार-पांच इंडिकेटर का इस्तेमाल। बाज़ार में सक्रिय खिलाड़ियों का पूरा आकलन। भाव कहां और क्यों रुख बदल सकते हैं, कहां पर एंट्री और कहांऔरऔर भी

जो लोग कहीं नौकरी या सुबह से शाम तक काम-धंधा कर रहे हैं, उनके लिए इंट्रा-डे ट्रेडिंग करना व्यावहारिक नहीं है। उन्हें तो स्विंग, मोमेंटम या पोजिशनल ट्रेड ही करना चाहिए। स्विंग ट्रेड पांच-सात या अधिकतम दस दिन के लिए होता है। इसमें सौदा वहां पकड़ते हैं जहां से कोई स्टॉक दिशा बदल सकता है। मोमेंटम ट्रेड भावों की दिशा में या ब्रेकआउट की संभावना को देखते हुए किया जाता है और इसकी अवधि 10-20 दिन कीऔरऔर भी