अमेरिका हिले तो डोलता वित्तीय जगत
दुनिया भर के वित्तीय बाज़ारों का केंद्र अमेरिका है। दुनिया की हर बड़ी-छोटी मुद्रा की संदर्भ मुद्रा अमेरिकी डॉलर है, भले ही वह बिटिश पाउंड हो या यूरोप का यूरो हो, जापान का येन हो, इंडोनेशिया का रुपैया हो या भारत का रुपया। अपना रुपया तो डॉलर के मुकाबले कमज़ोर होता-होता 81 रुपए तक जा पहुंचा है। हालांकि यूरो के मुकाबले वो मजबूत होकर 82 से 79 रुपए हो गया है। लेकिन इस तरह मुद्रा के डावांडोलऔरऔर भी
नीलकंठ कृषि बनेगा विकास का अग्रदूत
आईटी और बैंकिंग व फाइनेंस क्षेत्र में लाखों नौकरियों का बड़ा हल्ला होता है। लेकिन यह हकीकत कोई गले नहीं उतारता कि हमारे कृषि क्षेत्र ने अर्थव्यवस्था में बमुश्किल 15% हिस्सा रखने के बावजूद देश के 50% से ज्यादा लोगों को रोज़गार दे रखा है। दरअसल, भारतीय कृषि क्षेत्र सचमुच भगवान शिव की तरह नीलकंठ बना हुआ है। वह बेरोजगारी से लेकर भयंकर गरीबी तक का विष अगर गले से नीचे उतर जाने दे तो पूरा देशऔरऔर भी
ट्रेडिंग लहरों का खेल, लेकिन निवेश नहीं
वॉरेन बफेट किसी भी कंपनी में निवेश करने से पहले उसके मूलभूत पहलुओं का बेहद गहराई और बारीकी से अध्ययन करते रहे हैं। लेकिन गुण के साथ मात्रा का संतुलन ज़रूरी है। उनका कहना है, “सचमुच ज्यादा धन वही निवेशक बनाते हैं जो क्वालिटी के आधार पर सही फैसले करते हैं। लेकिन कम से कम मेरे विचार से पक्का धन मात्रा संबंधी फैसलों से बनता है।” इसी सोच पर चलते हुए बफेट संभावनाओं से भरी छोटी कंपनियोंऔरऔर भी
ट्रेडिंग है ठीक, लेकिन तरजीह निवेश को
वैसे तो निवेश भी एक तरह की ट्रेडिंग है। वह लम्बे समय की ट्रेडिंग है, जबकि ट्रेडिंग छोटे समय का निवेश। राकेश झुनझुनवाला ने दोनों को मिलाकर शेयर बाज़ार में कामयाबी हासिल की। लेकिन वॉरेन बफेट ने खुद को हमेशा निवेश तक सीमित रखा। वे अपने गुरु बेन ग्राहम से सीखे सिद्धांतों पर डटे रहे। उनमें काफी कुछ नया भी जोड़ा। उनकी सफलता के पीछे निवेश की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि स्टॉक्स का चयन भी था। ऐसाऔरऔर भी









