औद्योगिक इनपुट में घुसा हुआ है चीन!
ताज़ा खबर यह है कि चीन भारत की सीमा पर पिछले पांच सालों से जो 628 गांव बना रहा था, उनमें उसने अपने लोगों को बसाना शुरू कर दिया। इससे पहले वो जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में हमारी लगभग 800 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर कब्ज़ा कर चुका है। लेकिन एक सच्चाई जो कभी खबर नहीं बनी, वो यह है कि आत्मनिर्भर भारत और ‘मेक-इन इंडिया’ के नारों के बीच औद्योगिक इनपुट के लिए चीनऔरऔर भी
विकास कर्मनाशा, कृषि का बेड़ा गरक!
देश में आर्थिक विकास की उलटबांसी चल रही है। खुद सरकार के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2017-18 में कृषि में हमारी 44.1% श्रमशक्ति को रोजगार मिला हुआ था और मैन्यूफैक्चरिंग में 12.1% को। वित्त वर्ष 2021-22 तक विकास की ऐसी कर्मनाशा बही कि कृषि में लगी श्रमशक्ति बढ़कर 45.5% और मैन्यूफैक्चरिंग में घटकर 11.6% हो गई। श्रमशक्ति से बाहर निकलकर देखें तो देश की 60-70% आबादी अब भी किसी न किसी रूप में कृषि पर निर्भरऔरऔर भी
अर्थव्यवस्था के साथ सब अच्छा तो नहीं!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरिम बजट को समावेशी व इनोवेटिव बताया है। मगर यह न तो समोवेशी है और न ही इनोवेटिव। जिस विकास में रोज़गार ही नहीं बन रहा, वो समावेशी कैसे हो सकता है? खुद सरकार के आवधिक श्रम शक्ति सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के अनुसार देश में नियमित वेतन वाला रोज़गार पांच साल से ठहरा हुआ है। अधिकांश रोजगार जो बना है, वो अवैतनिक पारिवारिक श्रम या प्रछन्न बेरोज़गारी है। कृषि में वास्तविक मजदूरी घटी है।औरऔर भी
सब कुछ नकली, सारा कुछ हवा-हवाई!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर उनके तमाम मंत्री-संत्री दावा कर रहे हैं कि 2014 से पहले भारत दुनिया की उन पांच नाजुक अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा था जो विकास की फंडिंग के लिए अविश्सनीय विदेशी निवेश पर निर्भर थे। लेकिन साथ ही उनका दावा है कि 2014 से 2023 के बीच देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) दोगुना होकर 596 अरब डॉलर रहा है। इतना नकलीपना क्यों? पहले जो विदेशी निवेश कमज़ोरी की निशानी था, वहीऔरऔर भी






