मैं कह चुका हूं कि इस समय रीयल्टी सेक्टर मेरा पसंदीदा निवेश लक्ष्य है। लेकिन रीयल्टी में भी कौन? नई या पुरानी कंपनियां? इंडिया बुल्स रीयल एस्टेट, एचसीसी, एचडीआईएल, ओबेरॉय, लोढ़ा, ऑरबिट व शोभा डेवलपर्स बेहतर हैं या सेंचुरी, मफतलाल, बॉम्बे डाईंग, गल्फ ऑयल, वालचंदनगर व बीएफ यूटिलिटीज जिनके पास पुश्तैनी जमीन ढेर सारी है। साफ कर दूं कि यूं तो पूरा रीयल्टी सेक्टर निवेश के लिए इस समय अच्छा है। लेकिन इसमें भी पुश्तैनी जमीन रखनवालीऔरऔर भी

कल और आज कुल मिलाकर महज 10,000 करोड़ रुपए के ही सौदों का रोलओवर हुआ है। ऑपरेटर अपनी पोजिशन आगे ले जाने के मूड में नहीं है। कल निफ्टी में 6100 के ऊपर बहुत से खिलाड़ी टेक्निकल चार्टों से निकले यकीन के आधार पर लांग हो गए, यानी उन्होंने खरीद के सौदे कर लिए। लेकिन इस बार तकनीकी गलती की वजह से बाजार ने उन्हें अपनी राय बदलने को बाध्य कर दिया। इतना तय है कि 6050औरऔर भी

रिटेल निवेशक कब तक टेक्निकल एनालिस्टों के चार्टों की धुन पर, सपेरों की बीन पर सांप की तरह नाचते रहेंगे? यह एक बड़ा सवाल है और इसका जवाब रिटेल निवेशक ही दे सकते हैं। अभी तक वे ब्रांड-भक्त बने हुए हैं और अपने ही ब्रोकरों का कहा सुनते हैं। लेकिन इन ब्रोकरों का सरोकार तो अपने धंधे-पानी से ज्यादा और रिटेल निवेशकों की जेब से कम होता है। जैसी कि उम्मीद थी, चार्टवाले राग अलापने लगे किऔरऔर भी

कहा जा रहा है कि बाजार गिरावट का शिकार हो गया क्योंकि चीन के ब्याज दरें बढ़ाने से अमेरिका व यूरोप के साथ-साथ एशिया के भी बाजारों को भी चोट लगी है। लेकिन असली वजह यह नहीं है। अगर ऐसा होता तो बाजार बिना आपको कोई मौका दिए हुए सीधे 300 अंकों की गिरावट के साथ खुलता। लेकिन बाजार तो कमोबेश सपाट स्तर पर खुला। ज्यादा समय बढ़त की स्थिति में रहा और सारी बिकवाली कारोबार केऔरऔर भी

बाजार का बर्ताव वैसा ही रहा जैसा कि रोलओवर के करीब आने के दौरान होना चाहिए था। मालूम हो कि डेरिवेटिव सेगमेंट के लिए शुक्रवार, 1 अक्टूबर से शुरू हुआ सेटलमेंट गुरुवार, 28 अक्टूबर को खत्म हो जाएगा। इन 28 दिनों में कारोबारी दिन केवल 20 ही हैं। दिक्कत यह है कि हमें सेटलमेंट के करीब आने और रोलओवर होने का ख्याल ही नहीं रहता, जबकि इसके आसपास का समय भारी उतार-चढ़ाव और अफवाहों से भरा होताऔरऔर भी

सेंसेक्स का 20,500 अंक पर पहुंचना और चालू वित्त वर्ष 2010-11 के अनुमानित लाभ के 21 पी/ई अनुपात पर ट्रेड होना निश्चित रूप से ऐसे पहलू हैं जिन पर निवेशकों को ध्यान देने की जरूरत है। बाजार की मौजूदा तेजी की खास वजह ज्यादा तरलता या लिक्विडिटी है। इसलिए हमें खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि यह तरलता कब तक रहेगी? अगले दो महीने में 77,000 करोड़ रुपए के आईपीओ आने हैं जो बाजार से भारीऔरऔर भी

मैं ये दावा तो नहीं करता कि मैं सब कुछ समझता हूं। लेकिन इतना तय है कि मैं खुद को सर्वश्रेष्ठ होनेवाले का दावा करनेवाले तमाम एनालिस्टों से बेहतर समझता हूं। जब एफआईआई की खरीद के चलते बाजार में धन का प्रवाह बढ़ रहा हो, तब खरीद की कॉल देने के लिए किसी अतिरिक्त बुद्धि की जरूरत नहीं होती। इसका मतलब तब हात, जब आपने खरीद की कॉल तब दी होती, जब सेंसेक्स 8000, 15,000 या यहांऔरऔर भी

कोल इंडिया के आईपीओ के मूल्य-निर्धारण ने एफआईआई निवेश के जमकर आने का माहौल बना दिया है। इस इश्यू में बाहर से कम से कम 75,000 करोड़ रुपए आने की उम्मीद है। अगर विदेशी निवेशकों को कोल इंडिया के आईपीओ में आवंटन नहीं मिला तो वे इसके शेयर लिस्टिंग होने के बाद बाजार से खरीदेंगे। अगर कोल इंडिया का शेयर लिस्टिंग पर बहुत महंगा हो गया तो बाहर से आया यह धन एनएचपीसी, आरईसी और एनटीपीसी कीऔरऔर भी

बाजार ने ठीक दोहरी तलहटी बनाई और यह अनुमान हमने तभी जाहिर कर दिया था जब निफ्टी 6240 अंक पर था। लेकिन बाजार के लोग तब इसे सुनने-समझने को तैयार नहीं थे। निफ्टी में अब भी अंततः लक्ष्य 8000 का है। जो लोग ये बात ध्यान में रखते हैं और उसके हिसाब से ट्रेड या निवेश करते हैं, उन्हें बाजार से पैसे बनाने का मौका मिल सकता है। मसलन, सेंचुरी टेक्सटाइल्स पैसे बनाने के कम से दर्जनऔरऔर भी

मार्क मोबियस का कहना है कि हमें बाजार में करेक्शन के लिए तैयार रहना चाहिए। राकेश झुनझुनवाला भी इसी तरह की बात कह चुके हैं। इसलिए आपके लिए बड़ा सवाल यह है कि बाजार किस दिशा में जा रहा है। आपको जगह-जगह से सूचनाएं जुटाकर तय करना होगा कि आप खरीद की तरफ हैं या बिकवाली की तरफ या आपको झूलेलाल बना रहना है। एकदम सही कहा गया है कि बाजार सब कुछ जानता है और उसेऔरऔर भी