भारतीय बाजार कतई पारदर्शी नहीं हैं और फिजिकल सेटलमेंट के अभाव में यहां बाजार संचालित प्रणाली का सिद्धांत पूरी तरह विफल है। यह इकलौता बाजार है जहां वीआईपी इंडस्ट्रीज बुक वैल्यू के 11 गुने पर ट्रेड हो सकता है, जबकि फर्स्टसोर्स सोल्यूशंस (एफएसएल) बुक वैल्यू से 50 फीसदी नीचे पड़ा हुआ है। आज एफएसएल 6.35 फीसदी गिरकर 11.80 रुपए पर पहुंच गया, जबकि उसकी बुक वैल्यू 21.42 रुपए है। दूसरी तरफ वीआईपी इंडस्ट्रीज आज 6.74 फीसदी बढ़करऔरऔर भी

विश्व स्तर पर भी लगता है कि बद से बदतर हालात के असर को पूरी तरह जज्ब किया जा चुका है। ओवरसोल्ड हालत में पहुंच चुके दुनिया के शेयर बाजार से अब यहां से उठते चले जाएंगे। इस बीच भारतीय शेयर बाजार भी बेहद ओवरसोल्ड स्थिति में पहुंच गया है। डेरिवेटिव सौदों के रोलओवर में केवल सात दिन बचे हैं। इसलिए भारतीय बाजार की दिशा अब केवल बढ़ने की ही होनी है। इसी सेटलमेंट में निफ्टी 5500औरऔर भी

कभी सोचा है आपने कि केवल भारतीय ट्रेडरों और निवेशकों को ही इतनी ज्यादा वोलैटिलिटी, इतना भयंकर झंझावात क्यों झेलना पड़ता है? क्या आपने कभी सुना है कि अमेरिका का डाउ जोन्स सूचकांक लेहमान संकट व डाउनग्रेड जैसे विशेष हालात के अलावा सामान्य स्थिति में कभी दो दिन के अंदर 5% ऊपर-नीचे हुआ हो? लेकिन भारत में हर तीन महीने पर ऐसा होता है। बाजार को 5% का फटका लगता है, निवेशकों की दौलत में भारी सेंधऔरऔर भी

वैश्विक संकट ने ट्रेडरों और निवेशकों का फोकस ही बदल दिया है। अब वे हर दिन अमेरिका, डाउ जोन्स और यूरोप के बाजारों पर नजर रखने लगे हैं। वे दुनिया की तमाम वेबसाइटों को छान मारते हैं कि कौन-सा बैंक डिफॉल्टर हो गया या कौन-सा देश वित्तीय संकट की जद में आ रहा है। यहां तक कि वे उस देश के नागरिकों से भी ज्यादा अपडेट रहते हैं। जो निवेशक इस भागमभाग में कहीं गुम हो जाऔरऔर भी

अमेरिका ने संकट पैदा किया था और अमेरिका ही इलाज कर रहा है। वहां के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने तय किया है कि वह कम से कम दो साल तक ब्याज दरों को शून्य के आसपास बनाए रखेगा। दूसरे, तीसरी क्वांटिटेटिव ईजिंग (क्यूई-3) के आसार बढ़ गए हैं। इन दोनों ही चीजों ने अमेरिका समेत दुनिया भर के बाजारों में राहत का भाव भर दिया। सो दुनिया के बाजार बढ़े तो भारतीय बाजार भी बढ़ गया।औरऔर भी

अमेरिका के डाउ जोंस सूचकांक मे 600 अंकों की भारी गिरावट ने आखिरकार भारत व एशिया में आई गिरावट की बराबरी कर दी। भारत का बाजार पिछले दस महीनों से गिर रहा था, जबकि डाउ जोंस खुद को मजबूती से 12300 पर टिकाए हुए था। लेकिन अब उसे असली झटका लग चुका है। असल में विकसित देशों को लौटकर गया धन अब वहां से निकलकर फिर से भारत उभरते बाजारों की तरफ बढ़ रहा है। खैर, हमारेऔरऔर भी

अमेरिका का डाउनग्रेड होना चाहिए था या नहीं, यह अब बहस का नहीं, इतिहास का मसला बन चुका है क्योंकि एस एंड पी उसकी संप्रभु रेटिंग को डाउनग्रेड कर एएए से एए+ पर ला चुकी है। हो सकता है कि एएए रेटिंग वाले दूसरे देशों को भी बहुत जल्द ही डाउनग्रेड कर दिया जाए। लेकिन क्या इस तरह के डाउनग्रेड से सब कुछ खत्म हो जाता है? ऐसा कतई नहीं है। दुनिया और बाजार चलते रहे हैं,औरऔर भी

साल 2008 और 2009 में बाजार लेहमान संकट की भेंट चढ़ गया। अब 2011 पर यूरोप व अमेरिका का ऋण संकट मंडरा रहा है। अमेरिका की आर्थिक विकास दर के अनुमान को घटाकर 1 फीसदी कर दिया गया है। अमेरिका के इतिहास में यह भी पहली बार हुआ कि स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने शनिवार को उसकी रेटिंग एएए के सर्वोच्च स्तर से घटाकर एए+ कर दी और आगे एए भी कर सकती है। हालांकि अमेरिकी वित्त मंत्रालयऔरऔर भी

अमेरिका में मचा बवाल, डाउ जोंस का 512 अंक गिरना, एशियाई बाजारों को लगी चपत और यूरोप की अस्पष्टता अपने साथ भारतीय बाजार को भी बहा ले गई। वैसे, मंदडियों का समुदाय आज सबसे ज्यादा मौज में रहा होगा, बशर्ते उन्होंने पर्याप्त शॉर्ट सौदे कर रखे होंगे। लेकिन यह काफी मुश्किल लगता है क्योंकि बाजार में शॉर्ट सेलिंग के महारथी व जिगर वाले ट्रेडर मुठ्ठी भर ही हैं। उनके कौशल को मैं सलाम करता हूं क्योंकि मैंऔरऔर भी

कितने लोग जानते हैं कि टीटीके प्रेस्टिज को हमने पांच साल पहले 90 रुपए पर खरीदने की सलाह दी थी। हफ्ते भर पहले यह 3200 रुपए पर था। इस स्टॉक को फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (एफ एंड ओ) में रखे जाने की कोई जरूरत नहीं थी। फिर भी इसे एफ एंड ओ में डाल दिया गया और मंदड़िए अब इसे अपना आसान शिकार बनाएंगे। जिनके पास भी यह स्टॉक बड़ी मात्रा में हैं, उन्होंने डिलीवरी के एवज मेंऔरऔर भी