दो जरूरी सूत्र बाजार की आजादी के

कभी सोचा है आपने कि केवल भारतीय ट्रेडरों और निवेशकों को ही इतनी ज्यादा वोलैटिलिटी, इतना भयंकर झंझावात क्यों झेलना पड़ता है? क्या आपने कभी सुना है कि अमेरिका का डाउ जोन्स सूचकांक लेहमान संकट व डाउनग्रेड जैसे विशेष हालात के अलावा सामान्य स्थिति में कभी दो दिन के अंदर 5% ऊपर-नीचे हुआ हो? लेकिन भारत में हर तीन महीने पर ऐसा होता है। बाजार को 5% का फटका लगता है, निवेशकों की दौलत में भारी सेंध लगती है और बाजार फिर से वैताल की तरह पुरानी डाल से भी ऊपर जाकर बैठ जाता है।

आज हम बहुत साफगोई से कह सकते हैं कि भारतीय बाजार दुनिया के बाजारों की पूंछ से बंधा नहीं है। वह उनसे स्वतंत्र व अलग वजूद रखता है। बीएसई सेंसेक्स अक्टूबर 2010 के 21,000 से कई बार गिरकर साल 2011 में 16,800 तक जा चुका है, जबकि इसी दौरान डाउ जोन्स निरंतर बढ़त बनाए रखते हुए 12,000 के पार पहुंच गया जो लेहमान संकट के समय से 100 फीसदी ज्यादा है। ऐसा तब हो रहा है, जब भारत आर्थिक विकास दर के मामले में अमेरिका से बहुत-बहुत आगे है।

क्या हम पूंजी बाजार का ऐसा कोई मजबूत मॉडल नहीं बना सकते जहां उतार-चढ़ाव बहुत कम हों और वह एक स्थिर देश की सही छवि दर्शा सके। हमने इसका मॉडल पश्चिमी देशों से नकल किया है। लेकिन उनके यहां पूंजी बाजार में लगी निवेशकों की गाढ़ी कमाई की हिफाजत के लिए पर्याप्त इंतजाम हैं। शायद यही वजह है कि सामाजिक सुरक्षा से लेकर पीएफ व पेंशन व अन्य सरकारी फंड भी पूंजी बाजार, खासकर आईपीओ में निवेश करते हैं। हम देख चुके हैं कि खराब बाजार के बीच भी कैसे चीन का 7 अरब डॉलर और हांगकांग का 4 अरब डॉलर का आईपीओ मजे से सब्सक्राइब हो गया, जबकि भारत सरकार को 1-2 अरब डॉलर के इश्यू भी निकाल पाने में मुश्किल हो रही है।

सरकार स्टील अथॉरिटी (सेल) का एफपीओ लगातार टाल रही है। इस बीच कंपनी का बाजार पूंजीकरण 15,000 करोड़ रुपए से घटकर 5000 करोड़ रुपए से भी नीचे आ गया है। यकीन मानिए कि एफआईआई किसी दिन भारत सरकार को ऐसे ही गिरे भावों पर अपनी कंपनियों के शेयर बेचने को मजबूर कर देंगे। कोल इंडिया को छोड़ दें तो प्रत्येक आईपीओ या एफपीओ के साथ बराबर यही हो रहा है। हम पक्के तौर पर कह सकते हैं कि सरकार जब कभी कोल इंडिया के एफपीओ की घोषणा करेगी तो बाजार में इसके शेयरों पर हमला शुरू हो जाएगा और इसका बाजार पूंजीकरण गिराकर आधे पर ले आया जाएगा। क्या इससे कोल इंडिया काला सोना बन जाएगी, यह तो केवल वक्त ही बता सकता है।

गौरतलब है कि संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) ने 2001 में ही सेबी से कहा था कि उसे फिजिकल सेटलमेंट लागू कर देना चाहिए क्योंकि यह दुनिया भर में किसी भी डेरिवेटिव प्रणाली की मेरुदंड है। 2002 में सेबी के बोर्ड ने फिजिकल सेटलमेंट अपनाने का फैसला कर लिया, लेकिन तब इसके लिए जरूरी तंत्र तैयार नहीं था। 2010 में सेबी ने एक्सचेंजों को फिजिकल सेटलमेंट लागू करने का निर्देश दे दिया। बीएसई ने कर दिया। लेकिन एनएसई ने मना कर दिया। उसने कुछ और नायाब तरीके पेश कर दिए जिन्हें समझने में निवेशकों को एक और दशक लग जाएगा। शायद एनएसई इसको इसलिए लागू करने से बच रहा है क्योंकि यह बहुत कुछ बीएसई के पुराने बदला सिस्टम की तरह है। वक्त गवाह है कि बदला सिस्टम खत्म होते ही बीएसई में वोल्यूम खत्म होने लगा। इसके बाद बीएसई मात खाता रहा और एनएसई बढ़ता चला गया।

फिजिकल सेटलमेंट शेयरों को आस्ति की ऐसी श्रेणी बना देगा जिसमें शानदार फायदा मिल सकता है। इसमें निवेश पर रिटर्न (आरओआई) निश्चित रूप से बैंक की एफडी से ज्यादा होगा। इसलिए तमाम निवेशक भारी उतार-चढ़ाव के बावजूद इसमें सालों-साल के लिए धन लगाना पसंद करेंगे क्योंकि यह आस्ति उनके लिए बराबर कमाती रहेगी। निवेशकों का यह वर्ग भारतीय अवाम में सबसे धनी है। लेकिन इसने अपना निवेश इधर शेयरों से निकालकर बैंक एफडी और रीयल एस्टेट में डाल दिया है। इससे महंगाई बढ़ाने में योगदान किया है। यह भी सच है कि बहुत सारे निवेशकों ने अपना कालाधन सोने में डाल दिया है क्योंकि उसमें इक्विटी से कहीं ज्यादा रिटर्न मिल रहा है।

अगर आप पर लक्ष्मी की कृपा है तो आप अपने से एक सीधा सवाल पूछिए। अगर आपके पास 10 करोड़ रुपए हैं तो क्या आप उसे शेयर बाजार में लगाएंगे, जहां बहुत ज्यादा ऊंच-नीच होती है और आपकी पूंजी पलक झपकते ही साफ हो सकती है? पिछले दो सालों में 70 फीसदी आईपीओ ने निवेशकों द्वारा लगाया गया 70-75 फीसदी धन स्वाहा कर दिया है। ऐसी स्थिति में कोई निवेशक 10 करोड़ रुपए शेयर बाजार में नहीं लगाएगा। लेकिन आपको विकल्प दिया जाए कि सेटलमेंट के वक्त आप अपने शेयर उधार दे सकते हैं जिस पर आपको मांग व सप्लाई को देखते हुए ठीकठाक ब्याज मिल सकता है तो आप खुशी-खुशी अपने 10 करोड़ रुपए यहां लगा देंगे क्योंकि आपको कम से कम 12 से 15 फीसदी का औसत रिटर्न मिलेगा जो बैंक एफडी की ब्याज दर से काफी ज्यादा है और समय के साथ आपकी पूंजी को बचाने के लिए पर्याप्त है। यह भी होगा कि जो लोग उधार की इस प्रणाली में अपने शेयरों की डिलीवरी दे देंगे, वे हर गिरावट पर कैश सेगमेंट में नई खरीद कर सकते हैं। यह शेयर बाजार की चपलता को रोक लेगा, उस पर ब्रेक मार देगा। यह अपने आप में एक सिस्टम बन जाएगा।

यह सिद्धांत है शेयर बाजार के डेरिवेटिव और कैश सेगमेंट में संतुलन बनाने का। इससे भारतीय शेयर बाजार में भारतीयों की वापसी होगी और एफआईआई का जरूरत से ज्यादा दबदबा खत्म होगा। इससे एफआईआई को भी यह मौका मिलेगा कि वे जब चाहें, तब आसानी से बेचकर निकल लें। इससे अंततः एफआईआई निवेश का प्रवाह भी बढ़ेगा। यह छोटी व घरेलू ब्रोकिंग फर्मों के लिए लगातार बिजनेस पैदा करता रहेगा। अन्यथा इस समय तो अलगोरिदम ट्रेडिंग उन्हें फालतू बनाती जा रही है क्योंकि इसमें किसी ब्रोकर की दरकार नहीं पड़ती। सब कुछ कंप्यूटर पर लोड सॉफ्टवेयर करता है। इस पर समय रहते अमल कर लिया गया तो अभी जो हाल है और जैसा हम ऑडिट फर्मों के देख चुके हैं कि सारा धंधा ऊपर की पांच फर्मों तक सिमटे रहने का सिलसिला टूट जाएगा।

इसी तरह आईपीओ में लिस्टिंग के दिन भावों में होनेवाली धांधली को रोकने की जरूरत है। सेबी कोशिश में है कि इसकी सारी जिम्मेदारी मर्चेंट बैंकरों पर डाल दी जाए। लेकिन निश्चित तौर पर समाधान यह नहीं है। पहले दिन जिस तरह का जबरदस्त वोल्यूम होता है, उसमें व्यावहारिक रूप से उन लोगों की शिनाख्त संभव नहीं है जो शेयर को इस कदर उठाकर पटकते हैं। मूल्य को खोजने की यह दोहरी या कहें तो दोगली व्यवस्था बेहद संगीन समस्या है क्योंकि इसके चलते निवेशकों को तगड़ी चपत लग रही है। पहली बार मर्चेंट बैंकर सब कुछ देखभाल कर तय करता है कि किस पी/ई पर कंपनी के शेयर का मूल्य रखा जाना चाहिए। फिर दूसरी बार बिना किसी प्राइस बैंड के आप उसे बाजार में डाल देते हो कि वह मूल्य तय करे।

सिद्धांततः यह व्यवस्था ठीक लग सकती है क्योंकि बाजार मर्चेंट बैंकर का भूल-सुधार कर सकता है। लेकिन हमारे यहां तो आईपीओ के ऐसे महारथी ऑपरेटर बैठे हुए हैं जिनके पास वोल्यूम को चढ़ाकर पहले दिन भाव को नचाने का अपना करतब होता है। खासकर आईपीओ से पहले बेचे जा चुके इश्यू के मामले में तो वे गजब ढा देते हैं क्योंकि इनमें निवेशक जुटाने का काम भी उन्होंने किया होता है। उनके इस करतब में अनजान आम निवेशक पिस कर रह जाता है। यह अपने-आप में जबरदस्त घोटाला है।

इससे निपटने के लिए अमेरिका की तरह यहा भी हर आईपीओ में लिस्टिंग के बाद मार्केट-मेकिंग अनिवार्य कर देनी चाहिए और इस काम इश्यू के मर्चेंट बैंकर पर डालना चाहिए। इस जिम्मेदारी से मर्चेंट बैंकर के होश ठिकाने आ जाएंगे और वह न तो कभी आईपीओ के मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर आंकेगा और न ही लिस्टिंग के बाद शेयरों के मूल्य के साथ धांधली होने देगा। ऐसा होने से रिटेल निवेशकों की बाजार में वापसी होगी। वैसे, भी रिटेल निवेशक अक्सर प्राइमरी बाजार के जरिए ही प्रवेश करता है और उसे वहां अच्छा रिटर्न मिलता है तो सेंकंडरी या शेयर बाजार में उसका भरोसा जमता है।

हकीकत यह है कि केवल 1.8 फीसदी भारतीय इस समय शेयर बाजार में निवेश करते हैं। हमारा 35 फीसदी जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) बचत में बंद पड़ा है। सरकार का देशी कर्ज 31 मार्च 2011 तक 37.7 लाख करोड़ रुपए रहा है जो जीडीपी का 77 फीसदी है। कॉरपोरेट क्षेत्र के कर्ज का हाल भी कोई भिन्न नहीं है। यह अद्यन उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2010 तक 30 लाख करोड़ रुपए के आसपास है जो जीडीपी का 62 फीसदी बनता है। लेकिन ज्यादा अहम तथ्य यह है कि रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत का विदेशी कर्ज 305.9 अरब डॉलर या जीडीपी का 17.3 फीसदी है। यह 29 जुलाई 2011 तक रहे हमारे विदेशी मुद्रा भंडार 319 अरब डॉलर के एकदम आसपास है।

देश का विदेशी कर्ज पिछले एक साल में ही 17.2 फीसदी (45 अरब डॉलर) बढ़ा है जिसकी मुख्य वजह व्यावसायिक ऋण, अल्पकालिक व्यापार उधार और द्विपक्षीय व बहुपक्षीय उधार हैं। हमारा तकरीबन 60 फीसदी कर्ज डॉलर में है। अमेरिका में इकनॉमिक इंटेलिजेंस यूनिट (ईआईयू) के आंकड़ों के अनुसार वहां की केंद्र सरकार का कुल सार्वजनिक कर्ज 2010 में 17.4 फीसदी बढ़ने के बाद जीडीपी का 56.3 फीसदी रहा है। इससे वहां खतरे की घंटी बजी हुई है। भारत में कर्ज का बोझ अगर आर्थिक उत्पादन से ज्यादा रफ्तार से बढ़ता रहा तो हम आगे कर्ज फांस से बच नहीं पाएंगे। इस फांस से बचने के लिए भारी पूंजी का प्रवाह जरूरी है और ऐसा तभी संभव है जब आर्थिक विकास रफ्तार पकड़ ले। दिक्कत यह है कि हमारे नियामकों ने इधर मुद्रास्फीति को थामने के चक्कर में विकास की अहमियत कम कर रखी है। इसे वे ब्याज दरें बढ़ाकर मांग घटाने जैसे मौद्रिक उपायों से मुद्रास्फीति को बांधना चाहते हैं, जबकि असली समाधान सप्लाई बढ़ाने में है।

मुख्य मुद्दे पर वापस लौटा जाए। सारी दुनिया जानती है कि सबसे ज्यादा कालाधन भारत में है। रिश्वतखोरी व भ्रष्टाचार से निपटना बेहद मुश्किल है। यह सारे देश में प्लेग की तरह फैला हुआ है। इससे निकलने का आदर्श समाधान अपने ही लोगों पर भरोसा करने से निकल सकता है। अमेरिका व यूरोप मदद के लिए हमारी तरफ देख रहे हैं और हमने खुद को उनके एफआईआई के भरोसे छोड़ रखा है, यहां तक कि उन्हें अपनी ही जमीन पर दबंग बनने दे रहे हैं।

आज स्वतंत्रता दिवस के मौके पर यह कहना गलत नहीं होगा कि हमारे पूंजी बाजार को भी स्वतंत्रता की जरूरत है। यहां इस तरह के सार्थक सुधार लाए जाने चाहिए ताकि आम भारतीय भी निवेश करना सुरक्षित महसूस करे। इसका सबसे ज्यादा फायदा भारत सरकार को ही मिलेगा जो सार्वजनिक कंपनियों के शेयर बेचने में लगी है। अभी तक 5 फीसदी का भारी डिस्काउंट भी विनिवेश में रिटेल निवेशकों को नहीं खींच सका है। रिटेल निवेशकों को खींचने का एक तरीका यह हो सकता है कि सरकारी कंपनियों में निवेश पर उन्हें इनकम टैक्स में रियायत दी जाए। साथ ही उनकी पूंजी के संरक्षण के उपाय किए जाने चाहिए। यह बात हम सभी को अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि सरकार का कर्ज जितना बढ़ेगा, हम पर उतना ही ज्यादा टैक्स लगेगा। ऊपर से देश में पूंजी संरक्षण के साधनों का अभाव है। ऐसे में महज 3 फीसदी टैक्स देनेवाले भारतीयों पर बोझ और बढ़ जाएगा।

बाजार की अभी की हालत की बात करें तो ऑपरेटर इसे तलहटी पर पहुंचाने में लगे हैं। वैश्विक घटनाओं का इस्तेमाल यहां उथल-पुथल पैदा करने में किया जा रहा है। सेंसेक्स में 18,000 का स्तर मूल्यांकन के लिहाज से एकदम वाजिब स्तर है। इससे नीचे जाए तो दूरगामी निवेशकों को इसे बोनस समझना चाहिए। सेंसेक्स का 26,000 पर पहुंचना तय है क्योंकि ब्याज दरों को बढ़ाने का सिलसिला ज्यादा नहीं खिंचेगा। इस साल कृषि उत्पादन बढ़ने से खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति पर लगाम लगेगी। इसलिए मेरा सुझाव है कि निवेश के लिए बाजार के नई तलहटी पर पहुंचने का इंतजार मत कीजिए क्योंकि कोई नहीं जानता कि ‘यह बॉटम’ कहां है। इसका पता तो हो जाने के बाद ही चलता है।

अंत में आप सभी को इस भरोसे के साथ 65वें स्वतंत्रता दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं कि आजादी के 64 सालों में जो दुरुस्त नहीं हो पाया है, वह अगले नौ सालों में हो जाएगा और भारत 2020 तक सभी भारतीयों और भारत-भूमि की पूरी सामर्थ्य के उजागर होने से दुनिया की लोकतांत्रिक महाशक्ति बन जाएगा। इसकी ऐतिहासिक शुरुआत कल 16 अगस्त से दिल्ली के जयप्रकाश नारायण पार्क से हो रही है।

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