इस समय राजनीति ही नहीं, देश की अर्थनीति में भी अंधेरगर्दी चल रही है। ऐसा वे प्रशासक कर रहे हैं जो जनता से दूर रहते और सत्ता के गलियारों से होते हुए देश की नियामक संस्थाओं के लाटसाहब बन बैठे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा 1990 बैच के राजस्थान कैडर के आईएएस अफसर हैं। आईआईटी कानपुर से बी-टेक और अमेरिका की प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक पॉलिसी में मास्टर्स की डिग्री ली है। 11 दिसंबर 2024 से रिजर्व बैंक के गवर्नर हैं। पहले भारत सरकार में राजस्व सचिव थे। शास्त्रीय समझ कहती है कि मुद्रास्फीति को घटाने के लिए ब्याज दर बढ़ा देनी चाहिए। इससे लोगबाग कम खर्च करते हैं जिससे खपत या मांग बढ़ जाती है और सप्लाई उससे ज्यादा रहने से मुद्रास्फीति अपने-आप घटती चली जाती है। मूलतः इसी तर्क के आधार पर बीते हफ्ते संजय मल्होत्रा की लाटसाहबी में रिजर्व बैंक ने मौजूदा नीतिगत ब्याज या रेपो दर को 5.25% से उठाकर 5.50% कर दिया। सवाल उठता है कि देश में खपत का स्तर जब ज़मीन पर गिरकर लोट रहा हो, तब ब्याज दर बढ़ाकर खपत को और ज्यादा घटाने का क्या मतलब है? खपत कम, ऊपर से पूंजी की लागत बढ़ा दी गई तो देश में कौन सिरफिरा निवेश करेगा? वैसे भी सार्थक निवेश के बजाय देश के जन-जीवन पर फाइनेंस की जकड़बंदी घातक हद तक कसती जा रही है। अब सोमवार का व्योम…
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