कमाई कम, खर्च ज्यादा। अंतर को पाटने के लिए अमेरिका उधार लेता है। भारत का बाज़ार हिसाब चुकाता है। अमेरिकी सरकार इस साल मेच्योर हो रहे करीब 10 ट्रिलियन डॉलर के बॉन्डों की रिफाइनेंसिंग कर रही है। इनमें से अधिकांश बॉन्ड कोविड के समय तब जारी किए गए थे, जब ब्याज दर काफी कम थी। फेडरल रिजर्व ब्याज दर की रेंज बढ़ाकर 3.75% से 4.00% कर चुका है। अमेरिकी सरकार ज्यादा ब्याज नहीं देगी तो उसके बॉन्डों के खरीदार नहीं मिलेंगे। इस उम्मीद में उसके दस साल के बॉन्डों पर यील्ड की दर 5.25% तक पहुंच चुकी है। यह साल 2002 के बाद का सर्वोच्च स्तर है। दुनिया भर में फैले निवेशक ज्यादा रिटर्न के लिए अमेरिकी बॉन्डों में धन लगाने दौड़ पड़े हैं। इससे भारत जैसे देशों के शेयर बाज़ार से विदेशी निवेशक भागते जा रहे हैं और बाज़ार धड़ाम होता जा रहा है। रिजर्व बैंक ने अपनी तरफ से ब्याज दर 5.25% से बढ़ाकर 5.50% कर दी है। भारत सरकार के दस साल के बॉन्डों पर यील्ड बढ़कर 7.30% हो गई है। लेकिन क्या इससे विदेशी निवेशकों का भारत से पलायन रुक जाएगा? अगर नहीं तो हमारे शेयर बाज़ार का लुढ़कना जारी रहेगा। लेकिन आखिर ऐसा कब तक चलेगा? अब तथास्तु में आज की कंपनी…
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