नेहरू टैक्स से परहेज, मोदी टैक्स-खोर!

इस समय देश में गजब का समीकरण है। शीर्ष मौद्रिक संस्था, रिजर्व बैंक देश में किसी से भी एक धेला तक नहीं लेता, जबकि राजनीतिक सत्ता खुद एक धेला भी नहीं कमाती। सब कुछ या तो जनता पर लगाए टैक्स और सरकारी कंपनियों व संस्थाओं के लाभांश या देश की संप्रभुता को भुनाकर लिए गए ऋण से हासिल करती है। अवाम और सरकारी संस्थानों से हर दमड़ी वसूल करने का क्रूर सिलसिला 2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने सरकार बनाने के बाद चलाया। नरेंद्र मोदी ने अभी 4399 दिन देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने का जमकर जश्न मनाया तो कहा गया कि उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के 4398 दिनों का रिकॉर्ड तोड़ दिया। लेकिन नेहरू और मोदी के बुनियादी फर्क की कोई चर्चा नहीं कर रहा। 1947 में देश के आज़ाद होने के तुरंत बाद नेहरू ने जानेमाने सांख्यिकी विशेषज्ञ प्रोफेसर पी.सी. महालनोबिस को भारत के आर्थिक विकास का मॉडल तैयार करने का जिम्मा सौप दिया। महालनोबिस का बनाया मॉडल दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-1961) से लागू किया गया। इसकी मूल अवधारणा यह थी कि सरकार ऐसे बड़े-बड़े उद्यम खड़े कर दे जिससे इतना लाभांश मिले कि सरकार को जनता से टैक्स लेने की ज़रूरत ही न पड़े। साथ ही अमीरों से वेल्थ टैक्स लिया जाए। वहीं, मोदी ने अमीरों को भरपूर राहत दी और अवाम से दमड़ी तक नोंच ली। अब शुक्रवार का अभ्यास…

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