सरकार के नीति-नियामकों को दूर-दृष्टि और निकट-दृष्टि, दोनों ही दोष हो गए हैं। उन्हें न नजदीक का कुछ साफ दिख रहा है और न ही थोड़ी दूर का। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बारे में माना जा सकता है कि वे एक राजनीतिक शख्सियत है और उनकी कोई स्वतंत्र दृष्टि नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो कहते और सोचते हैं, उनकी गूंज बनना उनकी मजबूरी है। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक तो देश की मौद्रिक नीति का नियंता है। उसके गवर्नर से अपेक्षा की जाती है कि वो देशहित में दूर की सोचकर कोई बात बोलेगा और उसके अनुरूप कदम उठाएगा। अमेरिका में तो केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जेरोम पावेल राष्ट्रहित में डोनाल्ड ट्रम्प जैसे सनकी राष्ट्रपति तक से पंगा लेने से नहीं डरते। लेकिन अपने यहां रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा सरकार के चाकर हैं और उन्हें राष्ट्रहित में ज्यादा दूर की छोड़िए, महीने भर बाद की स्थिति का भी भान नहीं रहता। इस बार रविवार, 1 फरवरी को छुट्टी के दिन पेश बजट के बाद उन्होंने कहा था कि भारत दुर्लभ गोल्डीलॉक्स दौर से गुजर रहा है। अच्छी विकास दर, कम मुद्रास्फीति और कम बेरोज़गारी। बस अब नई छलांग का इंतज़ार है। लेकिन 27 दिन बाद ही 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका-इज़रायल के हमले ने गोल्डीलॉक्स के सारे पराए विदेशी मायालोक के परखच्चे उड़ा दिए तो हवाबाज़ी निकल गई। अब मंगलवार की दृष्टि…
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