भारत दुनिया में अमेरिका व चीन के बाद कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। हम अपनी मांग का 88% कच्चा तेल आयात करते हैं। एलपीजी और एलएनजी की जरूरत का भी 80-85% आयात करते हैं। कच्चे तेल और गैस का बड़ा हिस्सा हम पश्चिम एशिया या मध्य-पूर्व के देशों से लाते हैं। अमेरिका-इज़राइल और ईरान के युद्ध से यह पूरा आयात खतरे में पड़ गया है, खासकर ईरान द्वारा होर्मुज़ स्ट्रैट को बंद कर दिए जाने से। हमारी 50.5 लाख टन बैरल प्रतिदिन की कच्चे तेल की मांग में से 25 से 27 लाख टन बैरल (50-55%) इसी जल डमरू मध्य से होकर आता है। हमारी 80-85% एलपीजी और करीब 60% एलएनजी सप्लाई भी ईरान के नियंत्रण वाले इसे संकरे जलमार्ग से गुजरकर आती है। देश में 6-8 हफ्तों का ही कच्चा तेल भंडार है। मोदी सरकार को सचमुच देश की ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों की परवाह होती तो अमेरिका-इज़राइल के सामने घुटने टेकने के बजाय वो ईरान के पक्ष में खड़ा होता और चीन की तरह भारत के लिए कच्चे तेल व गैस की अबाधित आपूर्ति सुनिश्चित कर लेता। लेकिन अभी तो हमें रूस तक से तेल खरीदने की भीख अमेरिका से मांगनी पड़ रही है। ऊपर से अमेरिका भारत के न्यौते पर नौसेना अभ्यास में अतिथि बनकर आए ईरानी युद्धपोत को हिंद महासागर में डुबोकर हमारे मान-मर्दन में जुट गया है। अब शुक्रवार का अभ्यास…
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