सिस्टम के खोट पर नोट वो बनाते हैं

शेयर बाजार और क्रिकेट के मैच ज्यादातर हमेशा फिक्स होते हैं। हालांकि छोटी-मोटी अवधि में अनजाने कारकों के चलते बाजार अक्सर चौंकाता भी है। यह बात मनगढ़ंत नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। 2006 और 2007 में देश में मुद्रास्फीति की स्थिति इससे भी खराब थी। फिर भी 2007 में बाजार ने 21,300 का नया शिखर बनाया। इसलिए अगर आज विद्वान लोग मुद्रास्फीति और ब्याज दरें बढ़ने की चिंता को भारतीय इक्विटी बाजार की गिरावट की वजह बता रहे हैं तो यह कहीं न कहीं से अतिरंजित लगता है। असल में, यह बाजार को अपनी मुठ्ठी में रखनेवालों का खेल है।

यह बात तब और साफ हो जाएगी, जब इन सारी चिंताओं के बावजूद कॉरपोरेट क्षेत्र के लाभ बढ़ने की संभावना, बढ़ती तरलता व सरकार की स्पष्ट नीतियों के चलते बाजार (बीएसई सेंसेक्स) दोबारा 21,000 अंक के पार चला जाएगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि रिटेल व छोटे निवेशक बाजार में अपने हाथ जला चुके हैं और आनेवाले समय में भी उनके साथ यही होना है। इसकी सीधी-साधी वजह यह है कि रिटेल व छोटे निवेशक चमक के पीछे भागते हैं, असल के पीछे नहीं। उन्हें हर चमकनेवाली चीज को सोना समझने की आदत पड़ चुकी है।

एक बात जान लीजिए कि बाजार की मौजूदा गिरावट में राजनीति ने अहम भूमिका निभाई है। जरा गौर कीजिए कि किसी भी घोटाले, रिश्वतखोरी या सीबीआई जांच के मामले में कांग्रेस सरकार के किसी मंत्री का नाम नहीं आया है। विपक्ष ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर जरूर कुछ आरोप लगाए हैं। हालांकि मनमोहन सिंह निश्चित रूप से एक बेदाग ‘नौकरशाह’ हैं। लेकिन हर कोई जानता है कि कांग्रेसी इतने दूध के धुले न कभी थे और न अभी हैं। फिलहाल कांग्रेस ने निशाना साध कर अपने सहयोगी दलों को शॉक थिरैपी देने का सिलसिला चला रखा है। उसने उन्हें साफ संदेश दे दिया है कि वे सरकार छोड़ना चाहें तो छोड़ सकते हैं। लेकिन ऐसा करने पर उन्हें क्या झेलना पड़ सकता है, इसका ट्रेलर उसने दिखा दिया। पूरी पिक्चर तब रिलीज की जा सकती है जब वे सरकार के वजूद के लिए ही खतरा बन जाएंगे।

कॉरपोरेट जगत को भी उसकी करतूतों के लिए सबक सिखाया जा रहा है। सारी कसरत में शेयर बाजार जमींदोज हो चुका है। वाह! यह तो अगली मूवी की थीम हो सकती है जिसका नाम रखा जा सकता है कि स्ट्रीट दबंग। इस बीच ऑपरेटर अपना धंधा समेट कर मुंबई में कहीं छिप गए हैं इस डर से कहीं कंपनियां उन्हें बाजार में सहारा देने के लिए पकड़ न लें। आप मानें या मानें, लेकिन सच यही है कि एफआईआई ने सबकी आंखों के सामने मौके को ताड़कर पहले से कमजोर डेरिवेटिव सिस्टम का फायदा उठाते हुए बाजार को तोड़ डाला।

उन्होंने भ्रष्टाचार, मिस्र, मुद्रास्फीति और ब्याज दरें बढ़ने के अंदेशे को ढाल बनाया। बाजार में ऐसी नैकेड शॉर्ट सेलिंग की है जिस कभी भी साबित नहीं किया जा सकता। इस समय भारतीय शेयर बाजार में कुल 223 कंपनियों में डेरिवेटिव सौदे होते हैं। इन कंपनियों का बाजार पूंजीकरण 58 लाख करोड़ रुपए है। जबकि इनके फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस में ओपन इंटरेस्ट करीब 32,000 करोड़ रुपए का है। निफ्टी में मौजूदा ओपन इंटरेस्ट 14,000 करोड़ रुपए का है। नियमतः एफआईआई अपनी फंड सीमा के 100 फीसदी तक शॉर्ट हो सकते हैं। स्पष्ट है कि वे हमारे डेरिवेटिव प्रणाली कमजोरी और अपनी स्थिति का फायदा उठाकर बाजार में गदर काट सकते हैं। और, उन्होंने ऐसा किया भी है।

अभी जो गिरावट आई है, उसकी वजह यह नहीं है कि एफआईआई ने बेचकर अभी मुनाफा कमाया और इस तरह शेयरों को गिराया ताकि उन्हें सस्ते में फिर से खरीद लें। यह बड़ी मासूम-सी सरलीकृत सोच है जो सच नहीं है। ब्रिटिशों के सोचने का तरीका यह है कि पहले किसी को मनचाही चीज देकर लुभाओ और फिर उसे संकरी-अंधेरी गली में ले जाकर लूट लो, हलाल कर दो। बहुत से भारतीय उनके साथ जुड़कर ब्रोकिंग का धंधा करने में गर्व महूसस करते हैं क्योंकि उन्हें जमकर नोट मिलते हैं। उन्हें अपने नोट से मतलब होता है। उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि सामनेवाला क्या कर रहा है।

एक बात अच्छी तरह जान लें कि कोई भी एफआईआई भारत छोड़ना गवारा नहीं कर सकता। वे बाजार को निफ्टी के 5200 के स्तर पर लाना चाहते थे और वे उसे वहां तक ले आ चुके हैं। वे अब आपको बजट के पहले तक 5200 से 5600 के बीच नचाएंगे, खेलने का मौका देंगे। बजट अच्छा नहीं हुआ तो वे 5200 के स्तर को तोड़ने की एक और कोशिश करेंगे। बजट अगर असाधारण रूप से अच्छा हुआ तो वे आपको खरीदवाते-खरीदवाते 6200 तक ले जाएंगे।

इसलिए जोखिम अभी खत्म नहीं हुआ। लेहमान संकट के दौर से तुलना कीजिए। वो अक्टूबर 2008 में हुआ था और बाजार ने मार्च 2009 में तलहटी पकड़ी। इस बार कमजोरी के हालात नवंबर 2010 से शुरू हुए हैं और बाजार मार्च 2011 में अपनी तलहटी पकड़ सकता है। इसलिए हम सुरक्षित रूप से मान सकते हैं कि अप्रैल 2011 के बाद से बाजार अच्छा हो जाएगा। इसमें पहला लक्ष्य 21,000 का है और साल के अंत तक यह 24,000 तक पहुंच सकता है। ऐसा होना अपरिहार्य है। इसे कोई टाल नहीं सकता।

बहुत से लोग बाजार के फंडामेंटल विश्लेषण को नहीं समझ पाते और अच्छे लोगों पर नाकाम होने का ठप्पा लगा देते हैं। ऐसा इसलिए कि वे जो देखते हैं, उसे सही मान बैठते हैं। नीचे का तीर देखकर मान बैठते हैं कि अब सब कुछ चला गया। इस पर से मीडिया भी गिरावट के आलम की तस्दीक करता रहता है तो उनका रहा-सहा भरोसा भी चकनाचूर हो जाता है। एकमात्र अच्छी बात यह हुई है कि इस बार निवेशकों ने बडे पैमाने पर आत्महत्याएं नहीं की हैं जिसकी साफ वजह यह है कि रिटेल स्तर पर इस बार ज्यादा निवेश था ही नहीं। जिन लोगों को नुकसान हुआ है वे बाजार के बफर यानी, एचएनआई (हाई नेटवर्थ इंडीविजुअल) और ऑपरेटर हैं।

निवेशक घाटा उठाएं या कमाएं, रहें या भीड़ की भगदड़ का शिकार हो जाएं, बाजार का चक्र चलता रहेगा। फिलहाल रिंगमास्टर तैयार हैं ऩए फंड और सर्कस के नए दौर के साथ। हम कयासबाजी और सट्टेबाजी में यकीन नहीं करते। हालांकि हम जानते हैं कि अधिकांश निवेशक भी डे-ट्रेडिंग और सट्टेबाजी में लगे हुए हैं। हर बार सट्टेबाजी में यही लगता है कि हम जीतनेवाले हैं। लेकिन सट्टेबाजी का आखिरी हश्र बुरा ही होता है। इससे बचिए क्योंकि आगे की डगर बड़ी उज्ज्वल है। सरकार सही चीजें कर रही है। हम बहुत जल्दी ही पाएंगे कि माहौल ज्यादा पारदर्शी और स्वच्छ हो गया है। और, हमारा बाजार नई ऊंचाई पर पहुंचनेवाला है।

आशावाद और कुछ करे या न करे, वह प्रतिकूलताओं से लड़ने में आपको ज्यादा समर्थ व सक्षम बना देता है।

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