हम अक्सर अतिविश्वास में डूबे होते हैं। सौदा पिटने के बावजूद खुद को सही मानते हुए उससे चिपके रहते हैं। जैसे बंदरिया मरे हुए बच्चे को सीने से चिपकाए रहती है। स्वीकार कीजिए कि हम सही होने का सट्टा-बयाना लिखाकर नहीं आए हैं। बड़े-बड़े दिग्गज गलत हो जाते हैं तो हमारी क्या बिसात! सही तो ठीक। गलत तो पहला स्टॉप-लॉस लगते ही बाहर। चिपकने नहीं, छोड़ने में जीतने की असली सोच छिपी है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

हम सभी के साथ समस्या है कि हम पछताते बहुत हैं। बार-बार ऐसा होता है कि कोई शेयर देखकर छोड़ देते हैं। अगले दिन जब वो 5% से ज्यादा उछल जाता है तो पछताते हैं कि काश! वो सौदा पकड़ लिया होता। असल में, यह सामान्य मानव मनोविज्ञान है। लेकिन यह सहजता-भरी सोच ट्रेडिंग के लिए घातक है। हम समय में पीछे नहीं जा सकते। इसलिए हमेशा आगे देखने का अभ्यास करना चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बहुत सारे लोग मानते हैं कि शेयर बाज़ार सटोरियों का अड्डा है और यहां अधिकांश लोग जुआ खेलते हैं। यह मान्यता बहुत हद तक सही भी है। पिछले ही हफ्ते एक सब्सक्राइबर ने लिखा कि ऐसा जैकपॉट बताइए कि किस्मत चमक जाए। कैसे कहूं कि यह सोच एक तरह का डिप्रेशन दिखाती है। सच है कि बाज़ार में भविष्य का कयास लगाया जाता है, लेकिन यह सट्टेबाज़ी की तरह अंधा नहीं होता। अब निकालें मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार को समझने और पकड़ने के लिए कोशिश अर्थशास्त्र के जनक एडम स्मिथ के ज़माने से ही हो रही है। एक राय यह है कि भाव सभी पुरानी व नई उपलब्ध सूचनाओं के अलावा भावी संभावनाओं को भी जज्ब किए होते हैं। इसलिए अब तक के भावों का विश्लेषण कल के भावों का एकदम सटीक हाल बता देगा। वहीं, दूसरी राय इंसान की स्वभावगत कमज़ोरियों को भी तवज्जो देती है। अब देखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

ट्रेडिंग से कमाना चाहते हैं तो गांठ बांध लें कि शेयरों के भाव या बाज़ार का कोई भी पूर्वानुमान 100% सही नहीं हो सकता। यहां प्रायिकता चलती है। सिक्का उछालने पर हेड/टेल आने की प्रायिकता 50% रहती है। वैसे ही बाज़ार में प्रायिकता चलती है। हम ज्यादा प्रायिकता वाले सौदे चुनते हैं और चूकने पर चोट न खाएं, इसके लिए स्टॉप लॉस या पोजिशन साइजिंग का सहारा लेते हैं। अब करते हैं नए संवत का पहला अभ्यास…औरऔर भी

ट्रेडर, निवेशक, विश्लेषक सभी जानना चाहते हैं कि बाज़ार आगे कहां जाएगा, कोई शेयर कहां पहुंचेगा। लेकिन इस बाज़ार की विचित्र हकीकत यह है कि यहां एक ही वक्त एक ही स्टॉक या सूचकांक को लेकर लोगों की राय एक-दूसरे से उलट होती है। ऐसा न हो तो बाज़ार ठप पड़ जाए, कोई ट्रेडिंग ही न हो। बाज़ार एकदम बर्फ की मानिंद जम जाए। धारणा विपरीत तो अनुमान कैसे हों एक! अब पकड़ते हैं मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

सारे एक्जिट पोल गलत निकले। बस, एक्सिस-एड प्रिंट मीडिया का एक्जिट पोल ही सही निकला जिसमें उसने बिहार में महागठबंधन को 169 से 183 और एनडीए को 58 से 70 सीटें मिलने की बात कही थी। वही हुआ। पर, टीवी18 समूह ने उसे दिखाया नहीं क्योंकि वो उनकी सोच से मेल नहीं खाता था। भविष्य की गणना में ऐसी भूलचूक का होना स्वाभाविक है। शेयर बाज़ार भी इसका अपवाद नहीं है। अब पकड़ते हैं सोम का व्योम…औरऔर भी

कैलिफोर्निया के एक प्रोफेशनल ट्रेडर हैं। बड़े बैंकों व संस्थाओं में रह चुके हैं। बड़ी ईमानदारी से डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग की सलाह देते हैं। हाल ही उन्होंने निफ्टी ऑप्शंस में अल्गो-आधारित ट्रेडिंग सेवा शुरू की है। साल का सब्सक्रिप्शन एक लाख रुपए। हाल के उनके वेबिनार में सवाल उठे कि उनकी पुरानी सलाहें लगातार पिट क्यों रही हैं? सबक यह कि ट्रेडिंग में कोई भी अकाट्य नहीं; दूसरा मदद भर कर सकता है। अब शुक्र का अभ्सास…औरऔर भी

ट्रेडिंग में दिक्कत यह है कि इसमें बड़ी पूंजी चाहिए। कम से कम 50,000 रुपए महीने। फ्यूचर्स व ऑप्शंस में ट्रेड करना है तो उसमें सौदे का न्यूनतम आकार अब पांच लाख रुपए हो गया है। ऐसे में समझिए कि सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। इसलिए ट्रेडिंग उन्हें ही करनी चाहिए जिन्होंने बड़े अभ्यास व जतन से खुद अपना सिस्टम विकसित कर लिया हो। यहां भी महारथी तक अभिमन्यु को नहीं बचा पाते। अब पकड़ें गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ट्रेडिंग अगर जम जाए तो महीने में ही 10-15% कमाया जा सकता है। लेकिन ज्यादा रिटर्न अपने साथ ज्यादा रिस्क भी लाता है। ट्रेडिंग में रिस्क रहता है कि आपकी सारी पूंजी ही डूब जाए। इसके बावजूद कोई सामान्य निवेशक बाज़ार में निवेश व ट्रेडिंग दोनों का फायदा उठाना चाहता है तो बेहतर यही होगा कि वो अपने धन का 95% निवेश के लिए रखे और केवल 5% ट्रेडिंग में लगाए। अब आजमाते हैं बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी