कोई भी संस्था या अमीर शेयर बाज़ार में हमेशा के लिए निवेश नहीं करते। उनका मकसद है लाभ कमाना। इस बार बजट के बाद यही सिलसिला जारी है। वे रुक-रुककर मुनाफावसूली कर रहे हैं। पहले सेंसेक्स और निफ्टी ही गिर रहे थे। लेकिन अब मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों के शेयरों में भी बिकवाली शुरू हो गई है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के साथ ही अब देशी संस्थाएं भी खरीदने से ज्यादा बेचने लगी हैं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

जिन 1% सुपररिच या एचएनआई भारतीयों ने 2017 में 73% दौलत हासिल की, वे शेयर बाज़ार में म्यूचुअल फंडों के जरिए या सीधे निवेश करते हैं। बाज़ार में एलआईसी जैसी संस्थाएं भी जमकर पैसा लगाती हैं। उसने दिसंबर 2017 की तिमाही तक जिन 327 लिस्टेड कंपनियों में 1% से ज्यादा शेयर खरीद रखे हैं, उनमें उसका निवेश 6.26 लाख करोड़ रुपए है। ऐसी संस्थाएं और एचएनआई ही बाज़ार का रुख तय करते हैं। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

अमीर अपना इफरात धन शेयर बाज़ार में लगाते हैं। उनकी दौलत बढ़े तो बाज़ार में ज्यादा धन आता है। बीते साल 2017 में भारत में 1% अमीरों के हाथ 73% दौलत आ गई तो उनका धन बाज़ार में उमड़ पड़ा। पर लिस्टेड कंपनियों और उनके शेयरों की संख्या सीमित है। नतीजतन, ज्यादा धन बाज़ार को उठाता गया और हाल-फिलहाल गिरने के बावजूद इतना नहीं गिरा है कि आमलोगों की पकड़ में आ जाए। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

सरकारें आती हैं, जाती हैं। इसी तरह घोटाले आते हैं, जाते हैं। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था की निहित संभावना के पूरी तरह निखरने पर खास फर्क नहीं पड़ता। हां, थोड़ी देर हो सकती है। लेकिन भारत की विकासगाथा को परवान चढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। इसलिए आम निवेशक के लिए यही बेहतर होगा कि हवाबाज़ी या घबराहट में आए बगैर वो अच्छी कंपनियों के स्वामित्व में अपना छोटा हिस्सा जुटाता जाए। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

बजट से कल तक सेंसेक्स 4.48% गिर चुका है और वो 24.45 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है। लेकिन इसी दौरान स्मॉलकैप सूचकांक 2.45% और मिडकैप सूचकांक 2.71% ही गिरा है, जबकि ये क्रमशः 106.74 और 39.90 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहे हैं। जाहिर है कि आसमान पर चढ़े स्मॉलकैप और मिडकैप कंपनियों के शेयर नीचे उतरने का नाम ही नहीं ले रहे। मगर, देर-सबेर इनका गिरना तय है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हमारा शेयर बाज़ार मूल्यांकन के खतरनाक ज़ोन के काफी करीब है। इसे बाज़ार पूंजीकरण और जीडीपी के अनुपात से समझा जा सकता है। बीएसई का बाज़ार पूंजीकरण कल 1.49 लाख करोड़ रुपए रहा, जबकि बजट में बाज़ार मूल्य पर जीडीपी का संशोधित अनुमान 1.67 लाख करोड़ रुपए का है। इस तरह दोनों का अनुपात 89.22% बनता है। यह अनुपात 2008 में जब 100% के पार चला गया था तो सेंसेक्स 38% टूटा था। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

बजट के बाद से हमारा शेयर बाज़ार जिस तरह रह-रहकर हिचकोले खा रहा है, वह सिलसिला आखिर कब तक चलेगा? क्या वह आगे और ज्यादा नहीं गिर सकता या भारतीय अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित ताकत उसे चढ़ाती जाएगी? इन सवालों का जवाब फौरन नहीं दिया जा सकता। उधर, साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद विश्व बाज़ार में छोड़ी गई सस्ती पूंजी वापस खींची जा रही है। सस्ते धन का स्रोत सूख रहा है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

आज की ग्लोबल दुनिया में और कुछ हो या न हो, लेकिन वित्तीय बाज़ार सचमुच ग्लोबल हो गए हैं। ताजा अध्ययन से पता चला है कि अमेरिका के डाउ जोन्स सूचकांक और हमारे सेंसेक्स के बीच का को-रिलेशन पिछले 20 सालों में 0.89 से लेकर 0.94 तक रहा है। इतना गहरा रिश्ता अच्छा नहीं होता। इसके +1 होने का मतलब एकदम एक जैसा बर्ताव होता है, जबकि -1 एकदम विपरीत बर्ताव दिखाता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

उठना-गिरना शेयर बाज़ार का स्वभाव है। अहम बात है सही वक्त पर निवेश करना क्योंकि यही दिलाता है बाज़ार का भरपूर फायदा। बाज़ार इधर गिरा है। तमाम शेयर भी गिरे हैं। लेकिन यह गिरावट भी सही वक्त पर किए गए निवेश की बराबरी नहीं कर सकती। आज हम जो कंपनी उठा रहे हैं, उसमें अगर किसी ने पहले बताए हमारे वक्त पर निवेश किया होगा तो उसका धन 22 महीने में लगभग तीन गुना हो चुका होगा…औरऔर भी

अमेरिका में अकेले जनवरी महीने में दो लाख नई नौकरियां जुड़ना और उसके चलते ब्याज दर बढ़ाए जाने के भरोसे से डाउ जोन्स सूचकांक का लुढ़क जाना या अपने यहां लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स का लगना। बजट के बाद अपने शेयर बाज़ार के गिरने की दोनों ही वजहें मानी जा रही हैं। यह भी कहा जा रहा है कि शेयरों में बनते बुलबुले को तोड़ने के लिए सरकार ने यह टैक्स लगाया। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी