एनएसई के प्रमुख सूचकांक निफ्टी का भी हाल अलग नहीं है। उसमें शामिल 50 स्टॉक्स में बैंक व वित्तीय सेवा का वजन 37.65% है। इसके बाद ऊर्जा का 13.97%, आईटी का 12.59% और उपभोक्ता माल का 10.49% भार है। कंपनियों में सबसे अधिक 10.37% भार एचडीएफसी बैंक का, 7.52% रिलायंस का और 7.26% एचडीएफसी का है। सूचकांक में ऊपर की दस कंपनियों को मिला दें तो उनका ही भार 55.56% बन जाता है। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

बीएसई सेंसेक्स में 30 स्टॉक्स शामिल हैं। इनसे जुड़ी 30 कंपनियों का ही बाज़ार पूंजीकरण स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड सभी 4858 कंपनियों के कुल बाज़ार पूंजीकरण का करीब 42% बनता है। इस मायने में हम मान सकते हैं कि सेंसेक्स पूरे बाज़ार का सही प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन आप शायद यह जानकर आश्चर्य में पड़ जाएं कि सेंसेक्स में बैंकिंग व फाइनेंस क्षेत्र की नौ कंपनियां हैं और उसका कुल वजन 41.38% है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

हम आम तौर पर बीएसई सेंसेक्स व एनएसई निफ्टी से अपने शेयर बाज़ार का मिजाज पता करते हैं। यह भी माना जाता है कि शेयर बाज़ार हमारी अर्थव्यवस्था के वर्तमान ही नहीं, भविष्य तक का आईना पेश करते हैं। पर क्या हमारे प्रमुख सूचकांक वाकई अर्थव्यवस्था की समग्र तस्वीर पेश करते हैं? क्या बाज़ार की सही नब्ज़ पकड़ने के लिए हमें प्रमुख सूचकांकों से परे जाकर कुछ अन्य सूचकांकों को भी देखना होगा? अब सोम का व्योम…औरऔर भी

निवेश को सार्थक व सफल बनाने की राह में हमारी छह वृत्तियां या भावनाएं घातक साबित होती हैं। डर, लालच, भीड़ की भेड़चाल से बचने के बजाय उसी का अनुसरण, तर्क को ताक पर रखना, ईर्ष्या और अहंकार। हमारे भीतर अहंकार इतना भरा होता है कि मानने को तैयार ही नहीं होते कि हमसे गलती हो सकती है। लेकिन आत्मविश्वास इतना कम कि हमेशा भीड़ या औरों की तरफ देखते हैं। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

30 अप्रैल से 1 जून तक भारतीय शेयर बाज़ार के कैश सेगमेंट से एफआईआई ने 12,898 करोड़ रुपए निकाले हैं, जबकि घरेलू निवेशक सस्थाओं या डीआईआई ने 15,654 करोड़ रुपए डाले हैं। इसके बावजूद बीएसई सेंसेक्स इस दौरान मात्र 0.19% बढ़ा है। डीआईआई में भी म्यूचुअल फंडों व बैंकों ने कमोबेश हाथ खींच रखा है। निजी बीमा कंपनियों का धंधा मंदा है तो अधिकांश धन एलआईसी ही लगा रही है। लेकिन कब तक? अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

एफआईआई का भारतीय शेयर बाज़ार व बांडों से निकलना दुष्चक्र जैसा है। उनकी निकासी से देश में डॉलर की मात्रा घट जाती है तो डॉलर महंगा और रुपया सस्ता हो जाता है। अप्रैल के शुरू में जो डॉलर 65 रुपए का हुआ करता था, वो बाद में 68.70 रुपए तक चला गया। नीतजतन, रुपए में 5.69% अधिक कमाई भी एफआईआई के लिए डॉलर में ज़ीरो हो गई। बाज़ार गिरने की मार अलग से। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

अमेरिका में ब्याज दरें आगे बढ़ सकती हैं। इसलिए वहां के सरकारी बांडों पर यील्ड का बढ़ना तय है। वहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था की फौरी कमज़ोरी व राजनीतिक दुविधा उम्मीद के बल पर जमकर फूले शेयर बाज़ार को दबा सकती है। केयर रेटिंग्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2018 की तिमाही में 1377 लिस्टेड कंपनियों की शुद्ध बिक्री के बढ़ने की दर घटकर 9.1% पर और शुद्ध लाभ मार्जिन 6.3% आ गया है। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

दुनिया का हर निवेशक कम रिस्क में ज्यादा रिटर्न पाना चाहता है। विदेशी निवेशक भी इसी चाहत के वास्ते भारत से निकलने लगे हैं। अमेरिकी डॉलर को सबसे सुरक्षित मुद्रा और अमेरिकी सरकार के ट्रेडरी बांडों को सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है। दस साल के अमेरिकी बांड पर यील्ड अभी 2.92% चल रही है, जबकि पंद्रह दिन पहले 3.12% तक चली गई थी। वहीं भारतीय रुपए व बाज़ार की हालात डांवाडोल है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई या एफआईआई) भारत से खिसक रहे हैं। इस साल जनवरी से लेकर अब तक वे हमारे ऋण व इक्विटी बाज़ार से 32,521 करोड़ रुपए निकाल चुके हैं। इसमें से 29,776 करोड़ रुपए तो उन्होंने केवल मई माह में ही निकाले हैं जिसमें से 10,061 करोड़ रुपए इक्विटी, 19,654 करोड़ रुपए ऋण और 61 करोड़ रुपए हाइब्रिड प्रपत्रों से निकाले गए हैं। आखिर उनके इस बर्ताव की वजह क्या है? अब सोम का व्योम…औरऔर भी

निवेश का मतलब बाज़ार या किसी दूसरे को हराकर आगे बढ़ना नहीं है। इसका सीधा-सा मतलब है कि अपने को जीतना, अपनी नकारात्मक वृत्तियों पर विजय हासिल करना। जब हम अपने पर विजय हासिल कर लेते हैं और संपूर्ण इंसान बन जाते हैं, तभी हम सच्चे अर्थों में निवेशक बन पाते हैं। तब हम वर्तमान के यथार्थ धरातल पर खड़े होकर सारे रिस्क को समझते हुए भविष्य की योजना बनाते हैं। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी