अगर बातों से चुनावी जंग और कस्मे-वादों से दिल जीता जा सकता तो इसमें मोदी सरकार का कोई तोड़ नहीं है। सरकारी नौकरियों और शिक्षा में सवर्ण गरीबों के लिए 10% आरक्षण घोषित कर दिया। लेकिन इसे लागू करने का कोई इंतज़ाम नहीं किया। बजट में 12 करोड़ छोटी जोतवाले किसानों को सालाना 6000 रुपए देने की घोषणा कर दी। लेकिन इन किसानों की पहचान कैसे की जाएगी, यह तक स्पष्ट नहीं है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

चुनावी साल में पेश किए गए बजट का कोई मतलब नहीं होता। फिर भी एनडीए सरकार ने बजट में किसानों के खातों में 75,000 करोड़ रुपए डालने, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए पेंशन स्कीम और नौकरीपेशा तबके के लिए इनकम टैक्स की सीमा बढ़ाकर 5 लाख रुपए करने का ऐलान कर दिया। इन पर अमल मई में बननेवाली सरकार पर निर्भर है। लेकिन शेयर बाज़ार के नजरिए से यह अच्छा बजट है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

नकारात्मक खबर घबराहट पैदा कर दे तो शेयरों के भाव गोता लगा जाते हैं। कुछ महीने पहले यस बैंक के साथ यह हादसा हुआ था। हालांकि अब वह उससे उबरने लगा है। खबरों की ऐसी मार के वक्त अगर यकीन हो कि कंपनी की मूलभूत मजबूती बरकरार है और उसके धंधे का भविष्य संभावनामय है तो उसके डुबकी लगाते शेयर को लपकने का रिस्क लिया जा सकता है। आज तथास्तु में झटका खानेवाली ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी

अरुण जेटली इलाज कराने अमेरिका गए हैं तो उनकी जगह पीयूष गोयल आज बजट पेश कर रहे हैं। संविधान की व्यवस्था के मुताबिक, मई में लोकसभा चुनाव होने हैं तो यह मूलतः अंतरिम बजट है और इसे ‘वोट ऑन एकाउंट’ या लेखानुदान ही होना चाहिए ताकि नई सरकार बनने तक केंद्र में वर्तमान सरकार का कामकाज चलता रहे। लेकिन मोदी सरकार चुनावी चासनी फेंकने के लिए पूरा बजट पेश करने पर उतारू है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

बजट में न तो उद्योग के लिए कुछ होगा और न ही उसमें टैक्स संबंधी कुछ प्रस्ताव लाए जा सकते हैं। कारण यह कि अब कस्टम ड्यूटी के अलावा सारे परोक्ष टैक्स जीएसटी में समाहित हो गए हैं जिसकी दरों का फैसला जीएसटी परिषद करती है। वहीं, प्रत्यक्ष टैक्स में कॉरपोरेट टैक्स पहले ही घटाकर 25% किया जा चुका है, जबकि व्यक्तिगत इनकम टैक्स पर सरकार कुछ करने की स्थिति में नहीं है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

अर्थशास्त्रियों से लेकर देशी-विदेशी रेटिंग एजेंसियों तक के लिए इस बार सबसे अहम होगा यह देखना कि मोदी सरकार ने राजकोषीय घाटे का लक्ष्य कार्यकाल के अंतिम वर्ष 2018-19 में पूरा किया है या नहीं। राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी के 3.3% तक बांधने का था। लेकिन जानकारों के मुताबिक यह किसी भी सूरत में 3.7% से कम नहीं हो सकता। सरकार तय उधारी का 115% तो नवंबर तक ही उड़ा चुकी थी। अब बुध की बुद्धि…और भीऔर भी

इस बार के बजट में जो भी घोषणाएं होंगी, वे महद सदिच्छाएं हैं और उनका कोई व्यावहारिक मतलब नहीं है। अगर लोकसभा चुनावों में बहुमत हासिल करने के बाद दोबारा एनडीए सरकार बनती है, तब भी उसे अलग से पूर्ण बजट पेश करना पड़ेगा। वहीं, अगर एनडीए को बहुमत न मिला और कोई दूसरी सरकार बनी, तब तो यह अंतरिम बजट लेखानुदान ही बनकर रह जाएगा और इसकी सारी घोषणाएं बेकार चली जाएंगी। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

16वीं लोकसभा का अंतिम बजट सत्र गुरुवार, 31 जनवरी से शुरू हो रहा है। उस दिन आर्थिक समीक्षा पेश की जानी थी। अफसोस! इस बार ऐसी कोई समीक्षा पेश नहीं होगी। बजट सत्र 13 फरवरी तक चलेगा। लेकिन पूरा देश धीरे-धीरे चुनावमय होता जा रहा है तो बजट की परवाह सरकार के अलावा किसी को नहीं है। हालांकि बाज़ार के लिए यह पूरा हफ्ता बजटमय रहेगा और वह भविष्य के संकेत खोजना चाहेगा। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

धरती, जल, अग्नि व वायु को सदियों से हर जीवधारी के शरीर का आवश्यक अवयव माना गया है। इसी तरह किसी भी देश के लिए रणनीतिक महत्व के कुछ उद्योग होते हैं जो अनिवार्य रूप से हमेशा के लिए उससे जुड़े रहते हैं। इनकी उपयोगिता एफएमसीजी य दवा उद्योग से भी ज्यादा होती है। ऐसे उद्योग में सक्रिय प्रमुख कंपनियां लंबे निवेश के लिए बड़ी माफिक होती है। आज तथास्तु में ऐसे ही उद्योग की अहम कंपनी…औरऔर भी

जो ट्रेडर स्टॉक या इंडेक्स फ्यूचर्स में काम करते हैं, उनके लिए वीआईएक्स सूचकांक का कम रहना बड़े धीरज की मांग करता है क्योंकि ऐसे माहौल में उठने और गिरने के बीच का मार्जिन अमूमन थोड़ा होता है। ऐसे में कुशल ट्रेडर अनुशासन की डगर नहीं छोड़ता। वहीं, जो ट्रेडर अनुशासन का पालन नहीं करते, उन्हें बाज़ार की चंचलता डुबो डालती है। डर और अनिश्चितता के बीच भावनाओं में बह जाना आत्मघाती है। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी