कल क्या हुआ, यह हम सभी जानते हैं। लेकिन कल क्या होगा, यह कोई नहीं जानता। कल अच्छा भी हो सकता है, सामान्य भी और बुरा भी। एक अकेले व्यक्ति का इस पर कोई वश नहीं। हां, सामूहिक रूप से जरूर इसे कुछ हद तक बांधा जा सकता है।और भीऔर भी

कल जो हुआ, सो हुआ। कल क्या होगा, चिंता इसकी है। कारण, करने व सोचने का तरीका एकदम सही होने के बावजूद हम गलत साबित हो सकते हैं क्योंकि हम अतीत को नहीं, बल्कि भविष्य को साध रहे होते हैं और भविष्य में हमेशा रिस्क होता है।और भीऔर भी

सुखी वही है जिसकी दृष्टि सम्यक है, जो स्थिरता के साथ गति को भी देखता है, जो वर्तमान के साथ-साथ उसके भीतर पनपते भविष्य को समझने का माद्दा रखता है, जो अतीत के मोह में चिपक कर वर्तमान व भविष्य के प्रति शंकालु नहीं रहता।और भीऔर भी

चीजें जो कल थीं, आज नहीं हैं। आज जैसी हैं, वैसी कल नहीं रहेंगी। परिवर्तन का यही नियम है। यही जीवन है। इसलिए कल से चिपके रहने या आज को लेकर रोते रहने का कोई मतलब नहीं। सबक लो, बढ़ते चलो। यही सही है और उचित भी।और भीऔर भी

हम अक्सर अतीत के प्रति मोह, वर्तमान के प्रति खीझ और भविष्य के प्रति डर से भरे रहते हैं। कल, आज और कल को साधना जरूरी है। लेकिन उसके लिए हमें निर्मोही, निरपेक्ष और निडर बनना होगा।और भीऔर भी

अतीत से चिपके रहे तो वर्तमान को ठीक से नहीं जी सकते। अतीत को ठुकरा दिया, तब भी वर्तमान को ठीक से नहीं जी सकते क्योंकि अतीत ही हमें अपने कर्मों के सही-गलत होने का भान कराता है।और भीऔर भी

हम अमूमन यही माने रहते हैं कि हम तो चलते रहे, जबकि दूसरे ठहरे रहे। पर ये कैसे संभव है? एक पांव वर्तमान और दूसरा अतीत में रखकर रिश्ते नहीं चल सकते हैं। उन्हें समय के साथ लाना जरूरी है।और भीऔर भी

भारत अगर ऋषियों-मुनियों का देश रहा है तो एकबारगी यह उनसे रीता नहीं हो सकता। दिक्कत यह है कि हम भागकर अतीत की वादियों में यूं गुम हो जाते हैं कि वर्तमान को ठीक से देख ही नहीं पाते।और भीऔर भी

जो आनेवाले कल के सपने बुनते हुए जीते हैं, उनका आज अस्त-व्यस्त रहना स्वाभाविक है। जो गुजरे कल की नॉस्टैल्जिया में जीते हैं, उनका आज सीलन व घुटन भरा रहना भी उतना ही स्वाभाविक है।और भीऔर भी