पूर्ण-अपूर्ण
अपने-आप में तो हर कोई पूर्ण है। जानवर भी पूर्ण, इंसान भी पूर्ण। ओस की बूंद तक एकदम गोल। प्रकृति ने संतुलन का नियम ही ऐसा चला रखा है। पर बाहर से देखो तो सब कुछ अपूर्ण। गुमान तोड़कर देखने पर ही यह अपूर्णता नज़र आती है।और भीऔर भी
रोना हालात का
बाहरी हालात तो सबसे लिए वही होते हैं। जो अंदर से मजबूत होते हैं, वे उनसे टकराकर पहले से और ज्यादा तेजस्वी होकर उभरते हैं। लेकिन जिनके अंदर के हालात कमजोर होते हैं, वे दबकर मिट जाते हैं।और भीऔर भी
साध्य नहीं, साधन
अंदर की प्रकृति को बाहर की प्रकृति से मिला देना, प्रकृति के साथ एकाकार हो जाना ही लक्ष्य है। सत्ता और समाज अपने-आप में साध्य नहीं, बल्कि साधन हैं प्रकृति की विपुल संपदा में अपना हिस्सा पाने के।और भीऔर भी
भीतर का चक्र
सूरज यह सोचकर नहीं निकलता कि कमल को खिलाना है। चांद इसलिए नहीं उगता कि कुमुदिनी को हंसाना है। बादल भी बरसात के लिए नहीं बनते। यह तो चक्र है जो भीतर ही भीतर चलता है, बाहर नहीं।और भीऔर भी
खुला हर रहस्य
प्रकृति हर पल नाना रूपों में अपने ऐसे तमाम रहस्य हमें बताती रहती है जो हमारे खुश रहने के लिए जरूरी हैं। लेकिन हम हैं कि अपने में ही डूबे रहते हैं। बाहर देखते नहीं तो अंदर के कपाट बंद पड़े रहते हैं।और भीऔर भी

