देश के लिए सोचना आसान है, करना कठिन। सोचने के लिए बस भावना चाहिए, जबकि करने के लिए सही हालात का सच्चा ज्ञान जरूरी है। भावना में सच्चे, ज्ञान में कच्चे रहे तो सत्ता के लिए लार टपकाता कोई समूह हमारा इस्तेमाल कर लेता है।और भीऔर भी

जननी, जन्मभूमि और मातृभाषा के चयन की छूट हमें नहीं। जो मिला, उसे सम्मान से स्वीकार करना ही उचित है। पर सरकार व सत्ता तंत्र को राष्ट्र मान उसके गलत कृत्य को स्वीकार करना अनुचित है।और भीऔर भी

यह देश गांधी, सुभाष व पटेल का था, तब था। अभी हमारा है। जब हैं, तभी तक है क्योंकि देश तो वह पौध है जो पीढ़ी दर पीढ़ी लहलहाती रहती है। जो अगली पीढ़ी की नहीं सोचता, वह देशभक्त नहीं, भोगी है।और भीऔर भी

देश यकीनन वहां रहनेवालों से बनता है। लेकिन उसे रहने लायक बनाती हैं स्थानीय से लेकर राज्य व राष्ट्रीय सरकारें। अगर हर तरफ गंदगी, कदाचार व भ्रष्टाचार है तो पूरा सरकारी तंत्र ही देशद्रोही है।और भीऔर भी

सरहद और सरकारों के तंत्र से राष्ट्र नहीं बना करते। बहुमत का हुंकार भी राष्ट्र नहीं बनाता। इसे किसी पर थोपा नहीं जा सकता। राष्ट्र बनता है दिल से, भरोसे से और साझा समस्याओं की साझा समझ से।और भीऔर भी