स्ट्राइक रेट के बजाय हमें रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात को तवज्जो देनी चाहिए। मान लीजिए कि कोई ट्रेडिंग सेवा 3:1 का रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात लेकर चलती है, यानी वो ऐसे स्टॉक्स चुनती है जो बढ़े तो 6% बढ़ सकते हैं और गिरे तो 2% पर निकल जाना होगा। दस में से ऐसे छह सौदे गलत निकले तो घाटा 12% होगा, जबकि बाकी चार सही सौदे 24% देकर जाएंगे। यानी, 40% स्ट्राइक रेट पर भी 12% फायदा। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

जब भी हम ट्रेडिंग की कोई सेवा लेते हैं तो पहला सवाल यही पूछते हैं कि उसके सही होने की दर या स्ट्राइक रेट क्या है। लेकिन किसी समझदार ट्रेडर के लिए यह सवाल एकदम बेमानी है। दरअसल, यह ब्रोकरेज फर्मों के एनालिस्टों का मानदंड है क्योंकि इससे वे अपने को तीसमार-खां साबित करते हैं। इसके लिए वे घाटेवाले ट्रेड को लंबा खींचते और मुनाफेवाले ट्रेड को बीच में ही काट देते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

पांच बार सिक्का उछालने पर टेल निकला तो हमें लगता है कि छठीं बार हेड आना पक्का है। हमें अहसास नहीं कि हेड या टेल आने की प्रायिकता हमेशा 50% ही रहेगी, भले ही हज़ार क्या, लाख बार सिक्का उछाल लें। सहजबोध की यही गलती हम ट्रेडिंग में करते हैं। कई बार स्टॉस-लॉस लगता जाए तो मान बैठते हैं कि अगली बार फायदा ही होगा। यह कतई यथार्थपरक और तर्कसंगत सोच नहीं है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

हर कोई फटाफट नोट बनाना चाहता है। इसलिए बहुतेरे लोग अधीर होकर शेयर बाजार की तरफ दौड़ते हैं। ट्रेडिंग से जमकर कमाना चाहते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि ट्रेडिंग हर किसी के लिए नहीं है। इसके लिए शांत मन, साफ समझ और तगड़े अनुशासन की ज़रूरत होती है। अस्थिर मन, सुनी-सुनाई बातों या टिप्स के भीगे भागने और झटके में फैसले लेनेवाले यहां लंबे समय तक नहीं टिक पाते। अब गहते हैं मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

बाज़ार हमसे स्वतंत्र है। वो हमारे पहले था और बाद में भी रहेगा। उसकी चाल और स्वरूप के विकसित होने का अपना ढर्रा है। हमें उसके साथ लयताल बैठानी है। तभी हम वहां से कमा सकते हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि हम तारीख के हिसाब से पूरा रजिस्टर बनाएं कि कोई ट्रेड चुना तो क्यों चुना और उससे कब व क्यों निकले। अपने ही अनुभव की रौशनी में खुद सीखते जाना है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

ट्रेडिंग में एक और मनोविज्ञान बड़ा आम है। दांव अच्छा चल जाए तो अपना बखान और गलत पड़ जाए तो बाज़ार का दोष। गिनाने लगते हैं कि ऑपरेटर लोग बाज़ार में घुसे हुए हैं और बाज़ार को जहां जाना चाहिए, वहां से उलटी दिशा में ले जाते हैं। कहावत है कि नाच न आवै, आंगन टेढ़ा। बाज़ार में ऑपरेटर, समझदार निवेशक और भांति-भांति के लोग सक्रिय हैं। इन्हीं से बनता है बाज़ार है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

ट्रेडिंग करने वाले टेक्निकल एनालिसिस और चार्ट का सहारा लेते ही है। वे जानते हैं कि चार्ट में बाईं तरफ देखकर बताना कितना आसान है कि शेयर का भाव यहां से वहां क्यों गया। लेकिन असली चुनौती जो नहीं हुआ है, उसका पूर्वानुमान लगाने की है, चार्ट के दाहिने तरफ देखने की है जहां फिलहाल कोई भाव या चाल दर्ज नहीं। इसमें पिछले पैटर्न से मदद मिलती है, लेकिन अनिश्चितता खत्म नहीं होती। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

जो भविष्य में होना है, उसको लेकर हम बराबर दुविधा में रहते हैं। यह एकदम स्वाभाविक है। ऊपर से कितना भी बोलें, मगर अंदर-अंदर लगता है कि ऐसा नहीं भी हो सकता। लेकिन जब वही चीज़ हो जाए तो हम कहते हैं कि मैंने तो पहले ही बोला था कि ऐसा होगा। यह एक सहज मनोविज्ञान है जिससे हवाबाज़ी चाहे जितनी कर ली जाए, लेकिन ट्रेडिंग के लिए यह घातक है। अब पकड़ते हैं मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग है तो संख्याओं का खेल। लेकिन कितनी विचित्र बात यह है कि यह मूलतः मनोविज्ञान का खेल है। संख्याएं बाज़ार में हर सेकंड टिकर पर दौड़ती हैं। लेकिन किन संख्याओं को पकड़कर कहां छोड़ा जाए तो हम मुनाफा कमा सकते हैं, यह बाज़ार में सक्रिय ट्रेडरों व निवेशकों के मनोविज्ञान को समझने और अपनी भावनाओं को काबू में रखने पर निर्भर करता है। यह कला अभ्यास से आती है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

अभी बाज़ार के जो हालात हैं, उसमें अर्थव्यवस्था या कंपनियों का फंडामेंटल कहीं तेल लेने चला गया है। अमेरिका और तमाम यूरोपीय देशों ने ब्याज दर या पूंजी की लागत को आधा प्रतिशत से कम बना रखा है। जापान ने तो ब्याज दर को ऋणात्मक बना दिया है। वहां आपको बैंक में जमाधन रखने की कीमत चुकानी होती है। लगभग मुफ्त का यही धन भारत जैसे बाज़ारों में शेयरों के पीछे पड़ा है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी