नए-नए ट्रेडर के मन में बैठा रहता है कि उसे कम से कम 80% सौदे जीतने ही जीतने हैं, 20% हार भी जाए तो चलेगा। लेकिन हकीकत यह है कि शेयर बाज़ार की अनिश्चितता के बीच धुरंधर ट्रेडरों तक का औसत स्ट्राइक-रेट 60% से ज्यादा नहीं होता। कभी-कभी वे 40% सौदे ही जीतते और 60% सौदे गंवा देते हैं। फिर भी रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात को माकूल रखने के कारण वे नियमित कमाते रहते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

कुछ जानकार तो यहां तक कहते हैं कि शुरुआती ट्रेडरों को उन्हीं सौदों को हाथ लगाना चाहिए जिनमें रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात कम से कम 1:5 का हो। कहने का मतलब यह कि हमें अपनी व्यावहारिक सीमाओं को ध्यान में रखकर ही ट्रेडिंग करनी चाहिए। ट्रेडर को बराबर इसका भी हिसाब लगाते रहना चाहिए कि ब्रोकर के कमीशन और शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स वगैरह देने के बाद उसकी सचमुच की कमाई कितनी हो रही है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

छोटे घाटे और बड़े मुनाफे की रणनीति में हम वही सौदे चुनते हैं जिनमें रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात कम से कम 1:3 का होता है। यानी, 2% रिस्क तो 6% बढ़ने की गुंजाइश। रिवॉर्ड की झलक शेयर के भावों का चार्ट दिखा देता है। वह रिस्क भी दिखाता है। लेकिन रिस्क बड़ी व्यक्तिगत चीज़ है। हर किसी की रिस्क उठाने की क्षमता अलग-अलग होती है। शुरुआती ट्रेडर को अधिकतम 2% रिस्क लेकर ही चलना चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

डर व लालच की भावनाओं के वशीभूत होने के कारण आम ट्रेडर सही दांववाले सौदों में फटाफट मुनाफा पकड़कर निकल जाता है, जबकि उल्टे पड़े सौदों से चिपका रहता है। वो घाटा नहीं उठाना चाहता। उसे आशा रहती है कि बाज़ार ज़रूर पलटेगा और उसके सौदे फायदे में आ जाएंगे। यह सहज व सकारात्मक सोच ट्रेडिंग में सफलता के लिए गलत है। सही तरीका है छोटे घाटे और बड़े मुनाफे की रणनीति अपनाना। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेड/निवेश करने बहुतेरे आते हैं। मगर घाटा खाने के बाद किनारे लग जाते हैं। उनका कोई स्थाई मकसद नहीं होता। लेकिन जो लोग किसी भी वजह से सोच-विचारकर ट्रेडिंग को गंभीरता से चुनते हैं, उनके दो पक्के मकसद होते हैं; बराबर धन कमाना और कमाई कभी न गंवाना। बस, इसी के साथ वे डर व लालच की दो विकट भावनाओं में लिपट जाते हैं और बाज़ार उनसे खेलने लगता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

जिस तरह सिर्फ चिनगारी या लपटों को देखकर आप आग का स्रोत नहीं पकड़ सकते। उसी तरह सिर्फ भावों को देखकर स्टॉक की चाल नहीं पकड़ी जा सकती। यकीनन, सबसे ज़रूरी है कि भावना के बजाय तर्क से काम लेना। लेकिन तर्क सभी संबंधित तथ्यों को जुटाए बिना बुद्धि-विलास बन जाता है और किसी काम का नहीं रहता। भाव बराबर तब बढ़ता है जब संस्थाएं खरीदने को आतुर होती हैं, अन्यथा गिरते हैं। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

दुनिया के ग्लोबल होते जाने से तमाम शेयर बाजारों की भौगोलिक सीमाएं काफी हद तक मिट गई हैं। न्यूयॉर्क से टोक्यो और लंदन से दिल्ली तक अक्सर एक-सी लहर चलती है। फिर भी हर शेयर बाज़ार का अपना विशिष्ट स्वभाव होता है। इसमें भी हर स्टॉक का अपना अलग स्वभाव होता है। स्वभाव की यह भिन्नता उस शेयर बाज़ार या स्टॉक से चिपके अलग तरह के ट्रेडरों व निवेशकों से तय होती है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

बारिश का मौसम। पहले तेल के दीए, अब बिजली के बल्ब जलते हैं। लेकिन पतंगों में ऐसा रसायन होता है कि उन्हें कुछ और ही नज़र आता हैं। वे रौशनी पर टूट पड़ते हैं। दीए/बल्ब को कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन सुबह तक नीचे मृत पतंगों का ढेर लग जाता है। शेयर बाज़ार में रिटेल ट्रेडरों का यही हश्र होता है। बचना है तो उन्हें अपना नौसिखियापन छोड़कर प्रोफेशनलों जैसा हुनर सीखना होगा। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

किताबों या ऑनलाइन वीडियो से ट्रेडिंग सीखने तक तो गनीमत है। लाखों लोगों को लगता है कि वे बिजनेस चैनल देखकर ट्रेडिंग/निवेश में पारंगत हो जाएंगे। लाखों व सालों गंवाने के बाद उन्हें समझ में आता है कि वे मरीचिका में जी रहे थे। ट्रेडिंग में जीत का तुक्का किसी का भी लग सकता है। पर, बराबर जीतना है तो ट्रेडिंग के तर्क-सम्मत नियमों को निरतंर अभ्यास से अपना संस्कार बनाना पड़ता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बहुत आसान है यह कहना कि बाज़ार में प्रोफेशनल ट्रेडर सही वक्त पर एंट्री करते और सही वक्त पर निकलते हैं, जबकि नौसिखिया/रिटेल ट्रेडर गलत वक्त पर एंट्री और गलत वक्त पर बाहर निकलते हैं। अहम सवाल यह है कि इस गलत को सही करने का रास्ता क्या है? बहुत-से लोगों को लगता है कि कुछ किताबें पढ़ ली जाएं, ट्रेडिंग पर कुछ ऑन-लाइन वीडियो देख लिए जाएं तो सही रास्ता मिल जाएगा। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी