बाज़ार में बहुत ज्यादा उछल-कूद मची हो तो उसकी भावी गति का कोई भी अनुमान सही निकलना बेहद मुश्किल होता है। लगाने को आप अनुमान लगा ही सकते हैं, लेकिन अक्सर ये अनुमान गलत निकलते हैं तो मंजे हुए ट्रेडरों को भी तगड़ी मार लगती है। पिछले कुछ महीनों से अपने शेयर बाज़ार में यही चल रहा है। अचानक बढ़ते-बढ़ते बाज़ार लुढ़क जाता है तो गिरते-गिरते आखिरी वक्त पर एकबारगी उछल जाता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

अनहोनी के डर व सस्ते धन के प्रवाह के बीच अल्गोरिदम ट्रेडिंग ने भी बाज़ार के उतार-चढ़ाव को बढ़ा रखा है। ग्लोबल हो चुकी फाइनेंस की दुनिया में ऐसा हर तरफ हो रहा है। आप जानकर चौंक जाएंगे कि बीते हफ्ते बुधवार को अमेरिका का नैस्डैक-100 सूचकांक ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गया, लेकिन अगले ही दिन वहां के तमाम सूचकांक ताश के पत्तों की तरह बिखर गए। क्या पता, हालात कब सामान्य होंगे? अब मंगलवार की बुद्धि…औरऔर भी

रिस्क को आप प्रायिकता से संतुलित करने की कोशिश कर सकते हो। लेकिन अनिश्चितता में अंततः बीमा ही काम आती है। उसे किसी और तरीके से मापा या नाथा नहीं जा सकता। इस समय शेयर बाज़ार में ऐसी ही अनिश्चितता छाई है। एकदम नहीं पता कि आगे क्या होनेवाला है। अज्ञात का डर सबके मन में छाया है। लेकिन सस्ते ब्याज पर इफरात धन बहता आ रहा है तो बाज़ार चढ़ रहा है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

कोरोना की महामारी किसी बिजनेस के लिए बुरी है तो किसी के लिए अच्छी। मसलन, मार्च, अप्रैल व मई के कोरोना काल में पारले प्रोडक्ट्स की बिकी आठ दशको में सबसे ज्यादा बढ़ी है। इसमें 80-90% योगदान पारले-जी बिस्किट का है। इस दौरान एफएमसीजी व दवा कंपनियों का भी धंधा बढ़ा है। दूसरी तरफ देश की सबसे बड़ी कार निर्माता मारुति को कोरोना के चलते मई में उत्पादन 98% घटा देना पड़ा है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

प्रतिस्पर्धा, निष्पक्षता, उद्यमशीलता, मांग, सप्लाई व न्याय जैसे मूल्य बाज़ार का अभिन्न हिस्सा माने जाते हैं। लेकिन बाज़ार के साथ सब निष्पक्ष ही नहीं होता। रिलायंस ने कोरोना काल की घनघोर निराशा के बीच भी बाज़ार से जिस तरह से 1.51 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा जुटा लिए हैं, वह कमाल की बात है। लेकिन यह कमाल हासिल करने में सेबी, कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय और वित्त मंत्री तक ने उसकी मदद की है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

थोड़े दिनों की विपत्ति सामान्य दिनों से कहीं ज्यादा सिखाकर चली जाती है। कोरोना संकटकाल में शेयर बाज़ार ने भी हमें बहुत सारी सीख दी है। जैसे, खराब माहौल में मजूबत कंपनियों के शेयर गिरें तो उन्हें बेहिचक खरीद लें। रिलायंस 23 मार्च को 866.98 तक गिर गया था। लेकिन ढाई महीने बाद 8 जून को वही शेयर 1618.40 तक चढ़ गया। 86.67% का जबरदस्त रिटर्न। हालांकि उसके बाद 5.09% उतरा है। अब बुध की बुद्धि…और भीऔर भी

फाइनेंस की दुनिया वास्तविक दुनिया से बहुत अलग होती है। नहीं तो ऐसा कैसे होता कि जिन दिनों देश में कोरोना का कहर था, संक्रमण बढ़ रहा था, उसी दौरान रिलायंस ने जियो प्लेटफॉर्म्स के लिए फेसबुक, सिल्वर लेक, विस्टा इक्विटी पार्टनर्स, जनरल अटलांटिक, के के आर, अबूधाबी इन्वेस्टमेट अथॉरिटी व मुबाडाला जैसे नामी निवेशकों से 97,886 करोड़ रुपए जुटा लिए। राइट्स इश्यू से जुटाए गए 53,124 करोड़ रुपए अलग से हैं। अब मंगल की दृष्टि…और भीऔर भी

हिंदी के मशहूर जनकवि बाबा नागार्जुन की कविता हैं, “बहुत दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास। बहुत दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास। बहुत दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त, बहुत दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त। दाने आए घर के अंदर बहुत दिनों के बाद, धुआं उठा आंगन से ऊपर बहुत दिनों के बाद।” 75 दिन खिंचा लॉकडाउन बीतने पर ऐसा ही कुछ लगता है। अब सोमवार का व्योम…और भीऔर भी

हमने बायनॉमिअल प्राइसिंग मॉडल में बैंकवर्ड इंडक्शन करते हुए ऑप्शन का भाव पोर्टफोलियो के मिलान या रेप्लिकेशन से निकाला। हमने यह भी देखा कि गिनने में यह तरीका ज्यादा ही जटिल है। मात्र दो ही चरणों में बहुत सारी गणनाएं करनी पड़ीं। इसकी तुलना में रिस्क न्यूट्रल वैल्यूएशन इस मॉडल का काफी आसान तरीका है। इसमें गणना कई चरणों में नहीं करनी पड़ती। सब कुछ आसान व सहज है। वैसे, यह कैसे काम करता है और इसमेंऔरऔर भी

ऑप्शन प्राइसिंग के ब्लैक-शोल्स मॉडल की तह में जाने से पहले हम एक दूसरे प्राइसिंग मॉडल को जानने की कोशिश करते हैं जो बाद में ब्लैक-शोल्स मॉडल को ठीक से जानने में काम आ सकता है। यह है बायनोमिअल मॉडल। हम इसे यूरोपियन कॉल ऑप्शन पर लागू करके उसका भाव निकालेंगे। बाद में पुट ऑप्शन का भाव कॉल-पुट समता के आधार पर निकाल सकते हैं। याद रखें कि यूरोपियन ऑप्शन सौदे एक्सपायरी के वक्त ही काटे जाऔरऔर भी