आदत तो डालो
आदतों के बिना ज़िंदगी नहीं चलती। एकदम रसहीन बन जाती है। इसलिए आदतें तो डालनी ही पड़ती हैं। अब यह आप पर है कि आप खुद को अच्छी आदतों का गुलाम बनाते हैं या बुरी आदतों का।और भीऔर भी
आदतों के बिना ज़िंदगी नहीं चलती। एकदम रसहीन बन जाती है। इसलिए आदतें तो डालनी ही पड़ती हैं। अब यह आप पर है कि आप खुद को अच्छी आदतों का गुलाम बनाते हैं या बुरी आदतों का।और भीऔर भी
हिसाब लगाएं तो पता चलेगा कि हम तीन चौथाई से ज्यादा जीवन प्रतिक्रिया में जीते हैं। लेकिन प्रतिक्रिया नहीं, क्रिया-प्रधान जीवन होना चाहिए हमारा। दूसरे नहीं, हम ही तय करें कि हमें क्या करना है।और भीऔर भी
जब हम जवान होते हैं तो छोटी सी छोटी बात पर मरने पर उतारू हो जाते हैं। बूढ़े होते जाते हैं तो बड़ी सी बड़ी बात होने पर भी जीते रहना चाहते हैं। उम्र इफरात तो कोई भाव नहीं! उम्र कम तो इतना मूल्य!!और भीऔर भी
हर काम हर पल दुनिया में कहीं न कहीं होता रहता है। जीना-मरना, हंसना-रोना, मिलना-बिछुड़ना। अंतहीन छोरों से बंधी डोर उठती है, गिरती है। झूले या सांप नहीं, सागर की लहरों की तरह दौड़ती है जिंदगी।और भीऔर भी
जीवन की यात्रा और उसमें हर मोड़ पर सीखना एक अटूट श्रृंखला है। हम नहीं रहते तो हमारे बाल-बच्चे इसे आगे बढ़ाते हैं। कड़ी कभी कहीं टूटती। जब तक यह सृष्टि है, तब तक यह टूटेगी भी नहीं। लेकिन अगर अगली यात्रा तक पिछली यात्रा के सबक याद न रखे जाएं तो अंत में हम खाली हाथ रह जाते हैं। बर्तन के पेंदे में छेद हो तो उसमें डाला गया सारा तरल निकलता जाता है। इसलिए मित्रों!औरऔर भी
जमीन की हर इंच पर कोई न कोई काबिज है। मांगने पर महाभारत तय है। यूं तो व्योम भी हमारा है। पर, उसकी नींव के लिए भी जमीन चाहिए। इसलिए जीवन में संघर्ष के सिवा कोई रास्ता नहीं है पार्थ!और भीऔर भी
जब आप सिर्फ जिए चले जाते हो तो आप मन व शरीर के गुलाम होते हो। जब आप सोचकर जीते हो तब आप मन व शरीर के सारथी होते हो। जब आप लीक से हटकर जीते हो तो आप दृष्टा बन जाते हो।और भीऔर भी
प्रकृति से कैसे निपटना है, यह तो हर जीव की तरह हम मां के पेट से सीखकर आते हैं। समाज से निपटने की शुरुआती सीख हमें घर-परिवार, स्कूल व परिवेश से मिलती है। फिर जंग में हम अकेले होते हैं।और भीऔर भी
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