जब तक नौकरी का दबाव, तब तक अपने काम का समय नहीं। जब नौकरी से मुक्त होकर अपने काम की फुरसत, तब नौकरी की नियमित आय के रुक जाने से उपजी असुरक्षा और घबराहट। मतलब, काम तो दबाव के बीच ही हो सकता है।और भीऔर भी

अपने तक सीमित। खूंटे से बंधी ज़िंदगी। परोक्ष रूप से तंतुओं के तंतु भले ही ग्लोबल हो गए हों, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से रिश्ते बहुत सिकुड़ गए हैं। ऐसे में हांकनेवालों की मौज है क्योंकि किसी को सिर उठाकर उनकी तरफ झांकने की फुरसत ही नहीं है।और भीऔर भी