सूरज यह सोचकर नहीं निकलता कि कमल को खिलाना है। चांद इसलिए नहीं उगता कि कुमुदिनी को हंसाना है। बादल भी बरसात के लिए नहीं बनते। यह तो चक्र है जो भीतर ही भीतर चलता है, बाहर नहीं।और भीऔर भी

प्रकृति हर पल नाना रूपों में अपने ऐसे तमाम रहस्य हमें बताती रहती है जो हमारे खुश रहने के लिए जरूरी हैं। लेकिन हम हैं कि अपने में ही डूबे रहते हैं। बाहर देखते नहीं तो अंदर के कपाट बंद पड़े रहते हैं।और भीऔर भी

जब भी हम नया कुछ रचते हैं, रुके हुए सोते बहने लगते हैं, अंदर से ऐसी शक्तियां निकल आती हैं जिनका हमें आभास तक नहीं होता। इसलिए काम शुरू कर देना चाहिए, काबिलियत अपने-आप आ जाएगी।और भीऔर भी