जो गया वो बीत गया। यकीनन बीतता साल शेयर बाज़ार के ट्रेडरों और निवेशकों के लिए काफी अच्छा रहा है। पांच-सात दिन के ट्रेडर भी इस दौरान दो-तीन महीने के ट्रेड से कमाने लगे। धन के बराबर बने प्रवाह में ट्रेडर मजे से तैरते रहे। बिना किसी साफ रणनीति के इफरात धन वालों ने बाज़ार से जमकर कमाया है और अब मौज कर रहे हैं। बेहद कमज़ोर स्टॉक्स को छोड़ दें तो निवेशकों ने भी अच्छा लाभऔरऔर भी

सारे लक्षण यही हैं कि नए साल में महंगाई, खासकर खाद्य मुद्रास्फीति में उछाल आ सकता है। समस्या यह भी है जिन देशों के पास खाद्य वस्तुओं की अच्छी उपलब्धता है, वे भी मुंद्रास्फीति से लड़ने की भावी योजना बनाते हुए उनका निर्यात करने से बच रहे हैं। ऐसे में हर देश को खाद्य मुद्रास्फीति से अकेले-अकेले निपटना होगा। यह सबसे लिए बड़ी कठिन चुनौती है। यह कितनी गंभीर हो सकती है, इसका अंदाज़ा संयुक्त राष्ट्र सेऔरऔर भी

संकट तब से सुलग रहा है, जब से मार्च 2020 में कोरोना से निपटने के लिए देश में लॉकडाउन लगा। मजदूर विस्थापित हो गए। जो गांव लौटे, वे वापस लौटे तो सही। मगर इधर-उधर बिखर गए। सप्लाई की कड़ियां टूट गईं। फिर पेट्रोल-डीजल के दाम। कच्चे माल से लेकर ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ती गई। इसके ऊपर से ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु में असंतुलन से उपजी विकराल समस्याएं। मसलन, अमेरिका के जंगलों में लगी आग। इससे कैलिफोर्निया वऔरऔर भी

दुनिया भर में चरम पर पहुंचती मुद्रास्फीति ने सरकारों को ही नहीं, इन्वेस्टमेंट बैंकरो, वित्तीय बाजार के ट्रेडरों और केंद्रीय बैंकरों तक को परेशान कर रखा है। इसमें भी सबसे खतरनाक है खाद्य मुद्रास्फीति का बेहिसाब बढ़ने जाना। खाना-पीना एक ऐसी चीज़ है जिसमें मुद्रास्फीति से उसकी मांग या खपत नहीं घटती। बेहद गरीब लोगों को छोड़ दें तो बाकी लोग खाने-पीने में कटौती नहीं कर पाते। इस पर बढ़े खर्च की भरपाई वे अन्य चीजों कीऔरऔर भी

जी हां! महंगाई का हाहाकार। भारत ही नहीं, सारी दुनिया में। लगता है कि नए साल का केंद्रीय थीम बनने जा रही है महंगाई या मुद्रास्फीति। अमेरिका में जहां रिटेल मुद्रास्फीति की दर अमूमन 2-2.5% से ऊपर नहीं जाती थी, वहां 6.8% हो चुकी है। यूरोप में यह दर 4.9% चल रही है जो यूरो अपनाने के बाद के दो दशकों का सर्वोच्च स्तर है। अपने यहां रिटेल मुद्रास्फीति नवंबर में भले ही 4.91% रही है, लेकिनऔरऔर भी

कमाल की बात है कि सरकार के कोविड टास्क फोर्स की भविष्यवाणी सरासर गलत निकली। मार्च 2020 से लेकर अब तक भारत में लगभग साढ़े तीन करोड़ कोरोना मरीज आ चुके हैं। यह भी कमाल है कि दुनिया में इस महामारी के दूसरे सबसे बड़े शिकार देश का शेयर बाज़ार साल भर में 25% से ज्यादा बढ़ गया। अमेरिका से लेकर यूरोप व जापान जैसे विकसित देशों मे बेहद सस्ते ब्याज पर उपलब्ध इफरात धन भारत जैसेऔरऔर भी

व्यक्ति से बाहर समाज की बात की जाए कि साल 2020 में कोरोना की पहली लहर से लेकर साल 2021 में दूसरी लहर तक सारी ज़िंदगी उलट-पुलट हो गई। अब भी कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन का खतरा मंडरा रहा है। भारत सरकार के कोविड टास्क फोर्स के प्रमुख वी.के. पॉल ने तो कहा है कि ब्रिटेन से लेकर फांस व यूरोप के तमाम देशों में जिस तरह ओमिक्रॉन की मार बढ़ रही है, उसे देखते हुएऔरऔर भी

क्या रहे हैं साल 2021 के खास सबक? जिन्होंने भी शेयर बाज़ार से ट्रेडिंग को अपना प्रोफेशल बनाया है और इसी से अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं, उन्हें ये सबक निजी स्तर पर निकालने होंगे। उन पर मनन करना होगा ताकि नकारात्मक बातों को पीछे छोड़ सकारात्मक बातों के साथ आगे बढ़ा जा सके। मोटेतौर उन्हें समझना होगा कि मन के भंवरजाल से मुक्त होकर वे शेयर बाज़ार में जो सचमुच हो रहाऔरऔर भी

ठीक दस ट्रेडिंग दिनों के बाद नया साल 2022 शुरू हो जाएगा। पहले दो दिन शनिवार-रविवार का अवकाश। फिर सोमवार 3 जनवरी से शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग का चक्र शुरू। यकीनन बीत रहा साल 2021 बहुत सारे लोगों के लिए बहुत-बहुत कठिन रहा है। इसमें साधारण इंसान से लेकर दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शुमार बिल गेट्स तक शामिल हैं। गेट्स का कहना है कि 2021 उनके लिए अविश्सनीय रूप से कठिन रहा है। साथ हीऔरऔर भी

हर निवेशक या ट्रेडर रिटर्न का भूखा होता है। विदेशी निवेशक तो खासकर। अमेरिका से लेकर यूरोप व जापान तक के निवेशक विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफआईपी) के जरिए भारत से हर साल कम से कम 10-12% रिटर्न कमा रहे हैं जो उनके लिए अपने देश की तुलना में बहुत-बहुत ज्यादा है। वो भी मुद्रा उतार-चढ़ाव के रिस्क को मिटाकर क्योंकि रुपया डॉलर के मुकाबले बराबर 74-75 की रेंज में चल रहा है। विदेशी निवेशकों ने हमारे शेयरऔरऔर भी