शेयर बाज़ार अचानक जब धराशाई होने लगता है तब निवेश का वाजिब पोर्टफोलियो बनाने की अहमियत समझ में आती है। वैसे तो निफ्टी-50 और सेंसेक्स-30 भी क्रमशः 50 और 30 स्टॉक्स से मिलकर बना एक तरह का पोर्टफोलियो ही है। लेकिन इनका उठना-गिरना बाज़ार के उठने-गिरने का पर्याय है। इनके ज्यादा गिरने पर निवेश का पोर्टफोलियो ज्यादा न गिरे, ऐसी कंपनियों की टोकरी बनाना ही असली पोर्टफोलियो बनाना होता है। अमूमन 20-30 स्टॉक्स या कंपनियों की सूचीऔरऔर भी

हर बड़ी कंपनी अच्छी नहीं होती और हर छोटी कंपनी खराब नहीं होती। यह अलग बात है कि एफआईआई जैसे बड़े निवेशकों के लिए छोटी कंपनियां उस ‘मछली जल की रानी है’ की तरह होती हैं जिन्हें ‘हाथ लगाओ डर जाएगी, बाहर निकालो मर जाएगी।’ असल में इन कंपनियों की इक्विटी बेहद कम होती है जबकि एफआईआई की न्यूनतम खरीद भी अपेक्षाकृत बहुत बड़ी होती है। उनके घुसते ही ऐसी कंपनियों के शेयर चढ़ जाते और निकलतेऔरऔर भी

रिजर्व बैंक ने अंततः वह स्कीम शुरू ही कर दी जिसके जरिए आम लोग सीधे-सीधे सरकारी बांडों में निवेश कर सकते हैं। लेकिन सवाल उठता है कि जब उन्हें पीपीएफ में 7.1%, किसान विकास पत्र में 6.9%, एनएससी में 6.8% और सुकन्या समृद्धि योजना में 7.6% सुरक्षित सालाना ब्याज मिल रहा है तो वे 6.3% पाने के लिए सरकारी बांडों का रुख क्यों करेंगे? कुछ जानकार बताते हैं कि केंद्र सरकार को इस साल 12.5 लाख करोड़औरऔर भी

शेयर बाज़ार को प्रभावित करनेवाले सारे कारक सही-सही पता हों तो उसकी भावी दशा-दिशा निकाली जा सकती है। यह कोई रॉकेट साइंस या चमत्कार नहीं, बल्कि सीधा-सीधा गणित है। अंकगणित नहीं तो बीजगणित से लेकर लीनियर अल्जेबरा व कैल्कुलस तक से हम सटीक गणना कर सकते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि शेयर बाज़ार में एक कारक अज्ञात है जिसका बहुत हुआ तो अनुमान भर लगा सकते हैं। वो है यहां सक्रिय इंसानों को मनोविज्ञान। हमें अपनाऔरऔर भी

कागज़ का पतला पन्ना भी अगर दो फोल्ड का दो फोल्ड करते रहा जाए तो 42 बार ऐसा करने पर वह परत-दर-परत इतना मोटा हो जाएगा कि धरती से चांद तक से भी ऊपर चला जाएगा। जी हां, यह गणना आप खुद करके देख सकते हैं। अमूमन कागज़ के पन्ने की मोटाई 0.1 मिमी होती है। एक्सेल शीट पर 0.1*2^42 का हिसाब निकालें तो परिणाम आता है 4,39,804.65 किलोमीटर, जबकि धरती से चांद की दूरी है 3,84,400औरऔर भी

जो कोई शेयर बाज़ार में तीन साल से ज्यादा वक्त का लम्बा निवेश करना चाहता है, उसे यही नहीं देखना चाहिए कि कंपनी अच्छी व संभावनामय हो, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि उसका शेयर सस्ता हो। अन्यथा, अच्छी से अच्छी कंपनी ज्यादा भाव पर खरीद लो तो बाद में पछताना पड़ता है। इस तरह पछताने से अच्छा है कि अभी उसके शेयर को गिरकर माकूल रेंज में आने दिया जाए। मान लो कि गिरकर सही रेंजऔरऔर भी

ट्रेडिंग का मकसद शेयरों के तात्कालिक उतार-चढ़ाव से कम समय में मुनाफा कमाना होता है। इसलिए उसमें हमेशा लक्ष्य बनाकर चलना होता है। लेकिन निवेश का मकसद विजय अभियान पर निकली कंपनियों की सवारी करना है। शिनाख्त सही निकली तो ऐसी कंपनियों के शेयर दोगुने से दोगुने होते चले जाते हैं और निवेश करते वक्त बनाया गया लक्ष्य बार-बार फतेह होता रहता है। इसलिए निवेश में लक्ष्य पर पहुंचते ही निकल जाने में समझदारी नहीं है। कंपनीऔरऔर भी

जीवन में जो चीजें नहीं करनी हों, उनका पता हो (जैसे – हिंसा नहीं करनी, चोरी नहीं करनी, झूठ नहीं बोलना, नशा नहीं करना और व्यभिचार नहीं करना) तो हर तरफ कुशल-मंगल व सुकून रहता है। इसी तरह शेयर बाज़ार में पता हो कि कैसी कंपनियों या स्टॉक्स से बचकर रहना है तो निवेश बड़ा सुखदायी व लाभप्रद होता है। जीवन में ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे दूसरों को तकलीफ व परेशानी हो और शेयर बाज़ारऔरऔर भी

दिलों में सिहरन-सी है, दिमाग में भय-सा है कि शेयर बाज़ार कभी भी क्रैश हो सकता है। चीन का आर्थिक संकट और अमेरिका में लटके पड़े प्रमुख सरकारी बिल इन आशंकाओं के ठोस आधार हैं। ऊपर से बढ़ती मुद्रास्फीति और उसके असर को सम करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने पर विचार। बावजूद इसके बाज़ार थोड़ा-बहुत दम मारकर फिर चढ़ जाता है। चीन से उपजी चिंता ज्यादा ठोस है क्योंकि रीयल एस्टेट फर्म एवरग्रांड के अलावा वहांऔरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार में सक्रिय ज्यादातर लोगों की मानसिकता अब भी सट्टेबाज़ी की है। वे दिमाग से नहीं, किस्मत से खेलते हैं और बेहद लालच व भय की भावनाओं में झूलते रहते हैं तो तमाम शेयरों के भाव अतियों पर घूमते हैं। कभी बहुत ज्यादा तो कभी बहुत कम। ट्रेडिंग में तो कम पर खरीदो, ज्यादा पर बेचो का तरीका चलता ही है। लम्बे निवेश में भी हमें यह रणनीति अपनानी चाहिए। बाज़ार का जैसा स्वभाव है,औरऔर भी