अनिश्चितता से भरा समय है और अनिश्चितता से ही भरा है शेयर बाज़ार। इस अनिश्चितता से जूझने के लिए जिसने रिस्क लिया, उसने या तो कमाया या अनुभव से थोड़ी समझ और हौसला हासिल किया। जिसने रिस्क नहीं लिया तो धारा के साथ बह गया या बहते-बहते कहीं किनारे लग गया। करना क्या है, यह हर किसी को रिस्क लेने की अपनी क्षमता के हिसाब से तय करना है। शेयर बाज़ार का कोई भरोसा नहीं। बड़ों कोऔरऔर भी

ब्रिक्स का 18वां शिखर सम्मेलन। भारत ने चौथी बार इसकी अध्यक्षता की। इसके पांच मूल सदस्यों – ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका में भारत सबसे गरीब है। हमारी प्रति व्यक्ति आय 2550 डॉलर है, जबकि दक्षिण अफ्रीका की 6110 डॉलर, ब्राज़ील की 9930 डॉलर, चीन की 13,660 डॉलर और रूस की 15,160 डॉलर है। विश्व बैंक के जुलाई 2026 के ताजा मानक के मुताबिक 14,375 डॉलर या अधिक प्रति व्यक्ति वाला देश विकसित है, जबकिऔरऔर भी

हफ्ते के पहले दिन सोमवार को घोषित हुआ कि देश के जीडीपी की रीयल या सच्ची विकास दर, महंगाई के असर को खत्म करने के बाद 7.8% रही है। मतलब भारतीय अर्थव्यवस्था पश्चिम एशिया के संकट के बावजूद बमबम कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसे निजी उपलब्धि बताकर अपनी पीठ थपथपा रहे है। फिर भी हमारा शेयर बाज़ार मायूसी में जकड़ा रहा। हफ्ते के आखिरी ट्रेडिंग दिन, शुक्रवार तक निफ्टी-50 सूचकांक सोमवार के 24,080.40 सेऔरऔर भी

बाज़ार अपना चार महीनों से कदमताल किए जा रहा है। इस साल 29 अप्रैल को निफ्टी-50 सूचकांक 24,177.65 पर बंद हुआ था और अभी 28 अगस्त को 24,175.65 पर है। वहीं, साल के दूसरे दिन 2 जनवरी को यह 26,328.55 पर था, जहां से अब तक 8.18% गिर चुका है। निराशा और पस्ती का आलम है। देशी निवेशक संस्थाएं खासकर म्यूचुअल फंड और बीमा कंपनियां ज्यादा खरीद रही हैं, जबकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक उनसे कम बेच रहेऔरऔर भी

भारत तमाम गलत व खोखली नीतियों के बावजूद अगर कई सालों से दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है तो मूल वजह इसकी अंतर्निहित सामर्थ्य है। इसलिए यहां शेयर बाज़ार में लम्बे समय का निवेश आनेवाले कई दशकों तक लाभदायी होगा। लेकिन निवेश का पूरा फल पाने के लिए हमें पांच अहम पहलुओं पर गौर करना होता है। पहला, बढ़ती अर्थव्यवस्था में कौन-से उद्योग व सेवा क्षेत्र हैं जो अधिक तेज़ी से बढ़औरऔर भी

बेचनवाले तो गंजे को भी कंघी बेच देते हैं। इस समय शेयरों के निवेश में एआई के कमाल की ऐसी ही बिक्री चल रही है। वॉरेन बफेट, मेरिल लिंच के साथ राकेश झुनझुनवाला की बुद्धि व शैली से कंपनियों का चयन। ऊपर से फंडामेंटल और टेक्निकल एनालिसिस के मेल ‘कैनस्लिम’ का तड़का। देश में लिस्टेड करीब 6000 कपनियों के वित्तीय ही नहीं, गर्वनेंस तक का सारा डेटाबेस। दावा कि राजेश एक्सपोर्ट्स के घोटाले का संकेत एक सालऔरऔर भी

पुरुष बली नहिं होत है, समय होत बलवान। भीलन छीनी गोपियां, वही अर्जुन वही बाण। निवेश की दुनिया में भी समय की बड़ी महत्ता है। शर्त इतनी है कि जो कंपनी चुन रहे हैं, उसमें विकास की संभावनाएं भरपूर होनी चाहिए। फिर समय के साथ आपका निवेश पांच-दस साल में पांच-दस नहीं, बल्कि बीस-तीस गुना हो सकता है। मसलन, हमने इसी कॉलम में करीब दस साल पहले 11 सितंबर 2016 को अपार इंडस्ट्रीज़ को चुना था औरऔरऔर भी

सूचनाओं की भरमार है। तरह-तरह की इतनी सूचनाएं कि फैसला लेना मुश्किल। हाल-फिलहाल कंपनियों के जून तिमाही के नतीजे आ रहे हैं। इसी के साथ मैनेजमेंट के प्रजेंटेशन। फिर भांति-भांति के एनालिस्टों के विश्लेषण। ब्रोकरों की तरफ से खरीदने की संस्तुतियां। सबके पीछे कंपनी के वित्तीय नतीजों से लेकर सालाना रिपोर्ट तक। भूत से लेकर वर्तमान और भविष्य तक का गहरा विश्लेषण। गूगल के जेमिनाई या ओपन एआई के चैट जीपीटी पर कंपनी का नाम डालो। कंपनीऔरऔर भी

आम या रिटेल निवेशकों के लिए शेयर बाज़ार में सीधे निवेश का सूत्र इसमें छिपा है कि कैसे छोटी कंपनियों को तब पकड़ लिया जाए, जब उन पर बड़े निवेशकों की नज़र न पड़ी हो। वैसे भी छोटी कंपनियों को म्यूचुअल फंड या विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक आईपीओ के बाद अमूमन हाथ नहीं लगाते क्योंकि उनकी खरीद इतनी बड़ी होती है कि छोटी कंपनियों के शेयर अचानक चढ़ जाते हैं। इसलिए छोटी और संभावनामय कंपनियां दौलत बनाने केऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में अक्सर ऐसा कुछ होता रहता है जो पहले कभी नहीं हुआ। इसलिए दुनिया की तरह शेयर बाज़ार को भी स्थिर व शाश्वत नियमों से चलनेवाला तंत्र मान लेना गलत है। आज तक ऐसा नहीं हुआ कि आईपीओ के बाद लिस्ट होने से पहले ही किसी कंपनी के शेयरों को बेचने की सलाह या सेल-कॉल दे दी जाए। लेकिन भारत ही नहीं, दुनिया में वोल्यूम के आधार पर सबसे बड़े डेरिवेटिव एक्सचेंज एनएसई के साथऔरऔर भी