जिंदगी में अनिश्चितता है तो बदलाव भी शाश्वत है। फिर भी हम निरंतर निश्चितता व स्थायित्व की तलाश में लगे रहते हैं। हमारी चाहत व हकीकत के बीच संघर्ष निरंतर चलता है। तभी एक दिन हम निश्चित मृत्यु तक पहुंचकर मिट जाते हैं।और भीऔर भी

सपनों का मर जाना खतरनाक है, लेकिन उससे भी ज्यादा खतरनाक होता है सवालों का मर जाना। जिस पल से हम सवाल उठाना बंद कर देते हैं, उसी पल से हम यथास्थिति को गले लगा लेते हैं जिससे ज्ञान से लेकर सपनों तक का स्रोत बंद हो जाता है।और भीऔर भी

प्राण मरने पर ही शरीर नहीं छोड़ता, बल्कि जीवित रहते हुए भी प्राण तत्व घटता रहता है। पस्तहिम्मती और आत्मबल के डूबने के रूप में सामने आता है यह। हां, इस दौरान मृत्यु के जबड़े से जीवन को खींच लेने का विकल्प हमारे सामने खुला रहता है।और भीऔर भी

इतना सारा जानकर करेंगे क्या? अगले जन्म में तो फिर सिफर से शुरू करना है! मृत्यु के इस भाव और भय से जिएंगे तो सारा ज्ञान निरर्थक लगेगा। लेकिन जीवन के हर पल को डूबकर जीना है तो ज्ञान का हर क़तरा जीने को सघन बना देगा।और भीऔर भी

हमें हर वक्त अपना काम इतना टंच रखना चाहिए और जीवन को इतने मुक्त भाव से जीना चाहिए कि अगले ही पल अगर मौत हो जाए तो कतई मलाल न रहे कि हमने ये नहीं किया या वो नहीं किया। जिम्मेदारी से जीना। मुक्त मन से जाना।और भीऔर भी