अपना शेयर बाज़ार रिकॉर्ड ऊंचाई के आसपास मंडरा रहा है। निफ्टी और सेंसेक्स कुलांचे मार रहे हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था या उसकी माप करनेवाले जीडीपी की क्या स्थिति है? चालू वित्त वर्ष 2022-23 में जुलाई से सितंबर तक की तिमाही में हमारा जीडीपी 6.3% बढ़ा है। इसमें भी कृषि क्षेत्र की विकास दर 4.6% रही है जिस पर बहुत सारे विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि जब खुद केंद्रीय कृषि मंत्रालय कि इस बार खरीफऔरऔर भी

किसी समय शेयर बाज़ार को अर्थवयवस्था का बैरोमीटर माना जाता था। लेकिन क्या आज ऐसा नहीं है। हमारा शेयर बाज़ार इस समय ऐतिहासिक ऊंचाई के इर्दगिर्द घूम रहा है। लेकिन अर्थव्यवस्था की हालत नवंबर 2016 की नोटबंदी के बाद जो बिगड़ी और कोरोना महामारी से जैसा उसे तहस-नहस किया गया, उसके बाद उमंग नहीं लौट पा रही। टैक्स संग्रह ज़रूर बढ़ रहा है। लेकिन सरकार के फालतू खर्च ज्यादा रफ्तार से बढ़ रहे हैं। इन खर्चों कोऔरऔर भी

देश की मुद्रा की विनिमय दर और उसकी अर्थव्यवस्था में क्या सम्बन्ध है? कोई भी सीधा रिश्ता नहीं। दशकों पहले पीपीपी (परचेज़िंग पावर पैरिटी) का पैमाना चलता था। तब मुद्रा का बाहरी मूल्य उसके आंतरिक मूल्य से तय होता था। अलग-अलग मुद्राओं से संबंधित देश के भीतर चल रही मुद्रास्फीति के अंतर से उसकी मुद्रा की विनियम दर तय होती थी। तब देश के निर्यात व आयात का अंतर या चालू खाता खास मायने रखता था। लेकिनऔरऔर भी

बड़ी सीधी साफ-सी बात है कि किसी देश की अर्थव्यवस्था हमेशा उसकी अपनी मुद्रा में चलती है। अमेरिका की डॉलर में, ब्रिटेन की पौंड में, यूरोप की यूरो में तो भारत की रुपए में। लेकिन टेढ़ी-सी बात यह है कि क्या आज की ग्लोबल दुनिया में देश की अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित शक्ति और उसकी मुद्रा की विनिमय दर में कोई सीधा रिश्ता है? फिर सवाल यह भी उठता है कि क्या आज के माहौल में शेयर बाज़ारऔरऔर भी

ज्यों-ज्यों निफ्टी 20,000 अंक के करीब पहुंचता जा रहा है, बाज़ार में उन्माद बढ़ता जा रहा है। लेकिन किसी भी किस्म का उन्माद समझदारी को धुंधला कर देता है और हम बहक कर गलत फैसले ले सकते हैं। इसलिए उन्माद में भी हमें संतुलित रहना चाहिए। वहीं, अगर मान लीजिए कि निफ्टी 20,000 का स्तर छूने से पहले ही फिसलकर गिर गया या लम्बे तक सीमित रेंज में भटकता रहे, तब भी हमें न तो हताश होनाऔरऔर भी

निफ्टी के गिरने की गुंजाइश खत्म हो चुकी है। वो तो हर दिन नए से नया शिखर बनाता जा रहा है। 20,000 अंक से महज 6% दूर रह गया है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की खरीद जारी रही तो यह मंज़िल हफ्ते-दस दिन में ही हासिल हो सकती है। इसलिए हाल-फिलहाल ऐतिहासिक शिखर से 20% गिरने की आशंका खत्म हो चुकी है। दूसरे शब्दों में बाज़ार में मंदड़ियों का शिकंजा कसने के आसार नहीं दिख रहे। इसलिए ज्यादाऔरऔर भी

अतीत में निफ्टी के शिखर पर पहुंचने के बाद जो करेक्शन आए, वे अलग-अलग रहे हैं। जनवरी 2008 में निफ्टी शिखर पर पहुंचने के बाद सवा साल में 50% तक गिर गया था। यकीनन, अब उतना बड़ा करेक्शन होने की गुंजाइश नहीं दिखती। लेकिन बड़ा करेक्शन तो आ ही सकता है, इस आशंका से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता। हाल का जो करेक्शन अक्टूबर 2021 के शीर्ष के बाद जून 2022 तक आया था, वोऔरऔर भी

क्या निफ्टी 20,000 अंक के स्तर पर ज्यादा टिक पाएगा? जनवरी 2008 से अक्टूबर 2021 में हासिल निफ्टी के पिछले शिखर पर नज़र डालने से इसका पूरा जवाब नहीं तो संकेत ज़रूर मिल सकता है। जनवरी 2008 में निफ्टी 6257 के शिकर पर पहुंचा। लेकिन दो साल नौ महीने बाद अक्टूबर 2010 तक घटकर 6177 पर आ गया। फिर फऱवरी 2015 में 8809 तक पहुंचा और करीब डेढ़ साल बाद भी सितंबर 2016 में 8866 पर अटकाऔरऔर भी

बात बड़ी साफ है कि भारतीय शेयर बाज़ार में अगर निफ्टी के 20,000 अंक तक पहुंचने के बाद भी तेज़ी का नया दौर शुरू होना है तो वैश्विक स्तर पर, खासकर अमेरिका में भी आर्थिक उभार की स्थिति रहनी चाहिए। तब तक मोमेंटम स्टॉक्स के पीछे ज्यादा समय तक भागना घाटे का सौदा बन सकता है। खुद ही देख लीजिए कि एक समय बाज़ार के चहेते रहे ज़ोमैटो, नाइका, कारट्रेड, व पेटीएम जैसे स्टॉक्स का क्या हश्रऔरऔर भी

निफ्टी जब नए शिखर पर पहुंचने के बाद तेज़ी से 20,000 अंक की तरफ बढ़ रहा है, तब सबके दिमाग में एक सवाल तो यह है कि इस मंज़िल के बाद निफ्टी की दशा-दिशा क्या होगी? दूसरा सवाल यह कि जब विश्व अर्थव्यवस्था भारी अनिश्चितता से घिरी हो, अमेरिका से लेकर यूरोप व जापान तक आर्थिक मंदी की आशंका हो, तब भारत कितना अछूता रह सकता है? कॉरपोरेट जगत की मशहूर हस्ती और एचडीएफसी के चेयरमैन दीपकऔरऔर भी