मसला चाहे दीर्घकालिक निवेशक का हो या अल्पकालिक ट्रेडर का, उन्हें अगर शेयर बाज़ार से बराबर कमाना है तो दो ही सवाल मायने रखते हैं। पहला यह कि शेयर के भाव कहां से पलटी मारेंगे और दूसरा यह कि भाव उठते-उठते फिलहाल कहां तक जाएंगे। बहुत-से लोग सोचते हैं कि बाज़ार कहां मुड़ेगा और उसकी चाल क्या होगी, इसका अनुमान पहले से नहीं लगाया जा सकता। लेकिन यह पूरा नहीं, अधूरा सच है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

यह कोई अचंभे की बात नहीं कि बैंकों व वित्तीय संस्थाओं के ट्रेजरी विभाग में काम करनेवाले प्रोफेशनल वित्तीय बाज़ार में बहुत शिक्षित-प्रशिक्षित होते हैं। उनकी तनख्वाह भी औसत कर्मचारी से कई गुना होती है। वहीं, औसत निवेशक व ट्रेडर अक्सर मन की बात या किसी की टिप्स पर दांव लगाते हैं और अपनी बची-खुची पूंजी भी लुटाते रहते हैं। यह स्थिति किसी सरकार या संस्था को नहीं, उन्हें खुद ही बदलनी होगी। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग/निवेश में दो ही तरह के समूह सक्रिय रहते हैं। पहला वो जिसके लोग जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं। इसमें बैंक, वित्तीय संस्थाएं व प्रोफेशनल ट्रेडर आते हैं। दूसरे समूह में वे आते हैं जो नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। इसमें रिटेल ट्रेडर/निवेशक आते हैं जो अमूमन अंधेरे में तीर चलाते हैं। पहला समूह दूसरे समूह की भावुकता और उछलकूद से जमकर कमाता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

अच्छी बात है कि जून 2018 की तिमाही में हमारा जीडीपी 8.2% बढ़ गया है। यह पिछली नौ तिमाहियों की सबसे तेज़ विकास दर है। मगर चिंता की बात है कि यह तेज़ी सरकारी खर्च बढ़ने से आई है और सकल स्थाई पूंजी निर्माण या अर्थव्यवस्था में निवेश की दर 28.8% पर अटकी है, जबकि यूपीए सरकार के आखिरी व सबसे खराब साल 2013-14 तक में यह दर 31.3% रही थी। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

आम धारणा है कि शेयर बाज़ार में 95% ट्रेडर गंवाते और केवल 5% ट्रेडर कमाते हैं। लेकिन कड़वा सच यह है कि गंवाने वाले सभी रिटेल ट्रेडर हैं, जबकि कमाने वालों में प्रोफेशनल ट्रेडर, बैंक और देशी-विदेशी वित्तीय संस्थाएं शामिल हैं। रिटेल ट्रेडर अपने इस हश्र से तभी बच सकता है, जब वो संस्थाओं की शैली और राह अपना ले। इसके लिए उसे टेक्निकल से आगे बढ़ कर डिमांड-सप्लाई का सूत्र समझना होगा। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ार ऐसी जगह है जहां धोखा व फरेब जमकर चलता है। होता है कुछ और दिखाया जाता है कुछ और। बाज़ार काफी बढ़ चुका होता है, तब म्यूचुअल फंड खरीद करते हैं। लोगबाग खरीदने दौड़ पड़ते हैं। तभी अखबार, पत्रिकाएं और टीवी चैनल तेज़ी का हल्ला मचाते हैं। ऐसे माहौल में समझदार निवेशक हाथ बांधे रहते हैं, जबकि आम ट्रेडर भेड़चाल के शिकार हो जाते हैं और अपना सत्यानाश कर बैठते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

बराबर बढ़ते शेयर पर मन में संदेह कि आखिर वो कितना और बढ़ेगा। वहीं. बराबर गिरते शेयर को लेकर भरोसा कि आखिरकार वो कहां तक गिरेगा। रिटेल ट्रेडर इसी संदेह व भरोसे के बीच झूलते हैं और घाटा खाते हैं। वहीं, प्रोफेशनल ट्रेडर बराबर गिरते शेयरों को हाथ नहीं लगाते, जबकि अपट्रेन्ड वाले शेयरों को रिट्रेसमेंट या गिरने पर खरीद लेते हैं। दरअसल, गिरते शेयरों को ज़रा-सा बढ़ते ही बिकवाली दबा डालती है। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी

हालांकि रिटेल ट्रेडर को लॉन्ग या खरीदने के ही सौदे करने चाहिए क्योंकि शॉर्ट सौदों का रिस्क उनकी क्षमता से बाहर है। फिर भी उसे समझना तो चाहिए कि शेयरों के भाव गिरते क्यों हैं? किसी शेयर को बेचने की व्याकुलता ज्यादा हो और लोगबाग फटाफट उससे निकल लेना चाहते हों, तब वो गिरता चला जाता है। कंपनी के खराब नतीजे, प्रतिकूल खबर या उद्योग संबंधी नुकसानदेह नीति इसकी वजह हो सकती है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बाज़ार में ट्रेडिंग से कमाना है तो रिटेल ट्रेडर को समझना होगा कि शेयरों के भाव फटाफट बढ़ते क्यों हैं? सीधा-सा जवाब है कि किसी शेयर को खरीदने की आतुरता बढ़ जाए, संतुलन खरीद की तरफ झुक जाए तो वह बढ़ने लगता है। इसकी अनेक वजहें हो सकती हैं। कंपनी संबंधी माकूल खबर, बड़े खरीदार की एंट्री और भविष्य के बारे में किसी ब्रोकरेज़ हाउस या नामचीन निवेश सलाहकार संस्था की सकारात्मक रिपोर्ट। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

कंपनी का मुनाफा बढ़ रहा हो और उसका शेयर गिरा हुआ हो तो उसे खरीद लेना चाहिए। अगर मुनाफा बढ़ता रहे, फंडामेंटल्स मजबूत रहें और शेयर चढ़ रहा हो तो उसमें बने रहना चाहिए। वहीं, कंपनी का लाभ घटने लगे और शेयर गिरने लगे तो फौरन बेचकर निकल लेना चाहिए। अगर लाभ घटने के बावजूद कंपनी का शेयर बढ़ रहा हो, तब भी उससे निकल लेने में ही समझदारी है। आज तथास्तु में दो कंपनियों का जिक्र…औरऔर भी