कंपनी का बिजनेस भी बम-बम कर रहा हो और शेयर के भाव भी दबे हुए हों – ऐसी आदर्श स्थिति बहुत कम आती है। आमतौर पर शानदार बिजनेस कर रही कंपनी के शेयर सस्ते नहीं मिलते, जबकि डूबते शेयर भावों वाली कंपनियों के बिजनेस में दमखम नहीं होता। कारण यह है कि शेयर बाज़ार में निवेश को आतुर लोग कम से कम लाखों में हैं और अधिकांश लोगों के पास इफरात धन के साथ-साथ थोड़ी-बहुत पारखी नज़रऔरऔर भी

किसी-किसी दिन होता यह है कि तमाम सूचकांकों के सारे के सारे प्रमुख स्टॉक्स गिरे रहते हैं। पूरे बाज़ार में पस्ती छाई रहती है। ऐसे माहौल में हम कहां से स्टॉक्स चुन सकते हैं? दिक्कत यह है कि रिटेल ट्रेडर को उन्हीं स्टॉक्स में ट्रेड करना चाहिए जिनमें बढ़ने की भरपूर गुंजाइश हो। उनका रिस्क प्रोफाइल ऐसा है कि उन्हें शॉर्ट सेलिंग से परहेज़ करना चाहिए। ऐसे में एनएसई में सूचकांकों के पेज़ पर तीसरे सेगमेंट मेंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में हमारा या किसी भी बाहर वाले का ‘ज्ञान’ मोटामोटी ही होता है। बाज़ार की बारीकियां हर ट्रेडर को खुद अपने अभ्यास से पकड़नी होती है। फिर यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि बाज़ार में इस समय खेल क्या चल रहा है। मसलन, फिलहाल बाज़ार में बड़ी ऊंच-नीच चल रही है। समूचे बाज़ार में रुख बढ़ने का होता है। लेकिन निफ्टी और सेंसेक्स को चंद स्टॉक्स के दम पर दबा दिया जाता है। इसमेंऔरऔर भी

लम्बी व मध्यम अवधि, मतलब कुछ महीने और साल-दो साल से बढ़ने का रुख। लेकिन फिलहाल गिरावट। ऐसे स्टॉक्स को भी ट्रेडिंग के लिए पकड़ने की अलग विद्या है जो बताती है कि इन स्टॉक्स में प्रोफेशनर ट्रेडरों व संस्थाओं की खरीद कहां से शुरू हो सकती है और कहां तक जाने के बाद वे इनसे बाहर निकल सकते हैं। इसे डिमांड और सप्लाई का नियम कहते हैं। यह विद्या टेक्निकल एनालिसिस के फंडे से बाहर है।औरऔर भी

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग के लिए सही स्टॉक्स वे हैं जो किसी न किसी सूचकांक में शामिल हैं। कोई कितना भी कहे, कैसी भी जानदार टिप्स दें, हमें इनसे बाहर झांकना भी नहीं चाहिए। इनमें भी सबसे ऊपर है निफ्टी-50 जिसमें सेंसेक्स के सभी 30 स्टॉक्स शामिल हैं। इसके बाद आते हैं पहले निफ्टी नेक्स्ट-50, निफ्टी-100, निफ्टी-200 और निफ्टी-500 अंत में। अमूमन ट्रेडिंग के लिए इससे बाहर देखने की ज़रूरत नहीं होती। इन सूचकांकों में शामिल स्टॉक्सऔरऔर भी

जहां कम पता लगाया जा सकता है और अनिश्चितता ज्यादा होती है, वहां ज्यादा रिस्क होता है और जहां ज्यादा पता लगाया जा सकता है, वहां अनिश्चितता कम होने के साथ ही रिस्क भी घटता जाता है। इस पैमाने पर कसें तो लम्बे समय के निवेश में ज्यादा जानकारी के बल पर रिस्क घटाया जा सकता है। सवाल उठता है कि शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में रिस्क को न्यूनतम कैसे किया जाए क्योंकि हर कामयाब ट्रेडर काऔरऔर भी

कंपनी कितनी भी अच्छी हो, बिजनेस मॉडल कितना भी जानदार हो, लेकिन उसके शेयर को किसी भी भाव पर खरीद लेना सही नहीं होता। मसलन, जुबिलैंट फूडवर्क्स का धंधा जमा-जमाया है। एवेन्यू सुपरमार्ट्स (डी-मार्ट) का भी बिजनेस मॉडल जबरदस्त है। लेकिन जब निफ्टी 24.75 और सेंसेक्स 28.48 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है, तब जुबिलैंट फूडवर्क्स का शेयर 118.40 और डी-मार्ट का शेयर 223.04 के पी/ई अनुपात पर खरीदना नादानी ही नहीं, पागलपन है। शेयरऔरऔर भी

दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं मुद्राओं के जरिए आपस में जुड़ी रहती हैं और उनका संतुलन बनता-बिगड़ता रहता है। बीते 21 साल में विश्व अर्थव्यवस्था में अमेरिकी डॉलर का हिस्सा लभभग 12% घट गया है। यूरो का हिस्सा भी 28% से घटकर 20% पर आ गया है। फिर बाकी हिस्सा किसके पास है। दुनिया के वित्तीय बाज़ार का लगभग 5% ब्रिटिश पाउंड, 5% जापानी येन और मात्र 2.6% चीनी युआन के पास है। साफ है कि दुनिया की दूसरीऔरऔर भी

नए साल में एफपीआई की खरीद बढ़ने के साथ ही शेयर बाज़ार में तेज़ी का सुरूर चढ़ने लगा। उधर अमेरिका का सिस्टम में नोट छापकर डॉलर डालने और मुद्रास्फीति को थामने के लिए उसे वापस खींचने का क्रम जारी है। इस तरह वह अपनी अर्थव्यवस्था को गरम-ठंडा करता रहता है। लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था उसकी इस हरकत से प्रभावित होती है। वैसे, दुनिया के वित्तीय बाज़ार में अमेरिकी डॉलर का हिस्सा लगातार घटता जा रहा है। साल 2000औरऔर भी

अमेरिका में नोट छापकर सिस्टम में डालने और ज़रूरत प़ड़ने पर से वापस खींच लेने का सिलसिला 9 सितंबर 2001 को वर्ल्ड ट्रेडर सेंटर पर लादेन के आतंकी हमले के बाद से ही चल रहा है। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद यह ज्यादा तेज़ हो गया। तब तो यूरोप से लेकर जापान तक नोट छापकर सिस्टम में डालने लगे थे। करीब चार साल बाद बॉन्ड खरीदकर सिस्टम में नोट डालने का क्रम धीमा हुआ। लेकिनऔरऔर भी