निफ्टी आज 10 से 12 बजे के बीच दो बार 5600 के एकदम करीब चला गया। लेकिन 5592.90 के बाद उसे ऊपर खींच पाना मुश्किल हो गया। जैसा कि मुझे कल ही अंदेशा था और मैंने लिखा भी था कि निफ्टी में 5620 का स्तर आने से पहले मंदड़िये हमले पर उतर आए। उनकी बिकवाली के चलते बाजार दो बजे के आसपास गिरावट का शिकार हो गया, जबकि पहले वह बराबर बढ़त लेकर चल रहा था। ढाईऔरऔर भी

बाजार का बैरोमीटर, निफ्टी 5440 से बढ़कर 5586 पर पहुंच गया जो उस स्पष्ट रुझान की तस्दीक करता है जिसे हम पहले ही बता चुके हैं। असल में, फिजिकल सेटलमेंट के अभाव में पूरे सिस्टम के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। हमने पिछले कॉलम में तथ्यों व आंकड़ों के साथ दिखाया है कि डेरिवेटिव या एफ एंड ओ बाजार 32,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का नहीं है, जबकि इसे 1,15,000 करोड़ रुपए का दिखाया जाता है।औरऔर भी

एक तो बाजार की सांस ब्याज दरों के बढ़ने के कारण पहले ही उखड़ी हुई है और वो 200 दिनों के मूविंग औसत से नीचे जा चुका है। ऊपर से 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के सुप्रीम कोर्ट में आने ने हालत और खराब कर दी। इस माहौल का फायदा उठाकर बाजार के उस्ताद लोगों ने बडे पैमाने पर शॉर्ट सौदे करके माहौल को संगीन बना डाला। आज को मिला दें तो बाजार में गिरने का दौर नौ दिनोंऔरऔर भी

बाजार सुबह-सुबह ओवरसोल्ड हो गया क्योंकि कुछ ट्रेडरों व एफआईआई ने ब्याज दर में 50 आधार अंक (0.50 फीसदी) वृद्धि का अंदाज लगाकर शॉर्ट सौदे कर लिए। औरों को 25 आधार अंक बढ़ने की उम्मीद थी। जाहिर है शॉर्ट सेलर सही निकले तो उन्हें कवरिंग की जरूरत नहीं पड़ी। बाजार गिरता गया। वैसे भी, बाजार 20 दिनों के मूविंग औसत (डीएमए) के करीब पहुंच चुका है, हालांकि वो 200 दिनों के सामान्य मूविंग औसत (एसएमए) को तोड़करऔरऔर भी

अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मार क्या गिराया, तमाम जिंसों के दाम धड़ाम-धड़ाम गिरने लगे। चांदी पर निचला सर्किट लग गया। एक हफ्ते में चांदी पर लगा यह दूसरा निचला स्रर्किट है। यह संकेत है इसके भावी हश्र का। इस पर मार्जिन भी अब काफी बढ़ा दिया गया है। इससे इसमें और गिरावट आएगी और यह 60,000 प्रति किलो के नीचे जा सकती है। फिलहाल कारोबारियों में इसमें निचले स्तर पर खरीद की चर्चाएं चल पड़ीऔरऔर भी

अपैल खत्म, मई आ गया। अप्रैल में तो शेयर बाजार कंपनियों के नतीजों के हिसाब से डोलता रहा। जिन कंपनियों ने उम्मीद से बेहतर नतीजे घोषित किए, उनके शेयर ठीकठाक चले, जबकि जो कंपनियां बाजार की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरीं, उनके शेयरों को तोड़ दिया गया। इनमें रिलायंस इंडस्ट्रीज, इनफोसिस व सेल जैसी कंपनियां शामिल हैं। ऐसा होना एकदम स्वाभाविक था। इसलिए इसमें किसी अचंभे की बात नहीं है। वैसे, अभी अगले दो हफ्ते तक मिडऔरऔर भी

पिछले हफ्ते बाजार के बराबर बढ़ने के बाद हमने अंदेशा जताया था कि रोलओवर के चलते इस हफ्ते बाजार में उतार-चढ़ाव का दौर चलेगा। सोमवार को बाजार लहरों की तरह उठता-गिरता रहा। मंगलवार को उसके गिरने-उठने का ग्राफ किसी माला के आकार का रहा। हालांकि दोनों ही दिन सुबह की गिरावट शाम तक आते-आते संभल गई। इस उथल-पुथल से खास फर्क नहीं पड़ता। इसकी वजह रोलओवर है और बड़े रोलओवर होने अभी बाकी हैं। निफ्टी 5810-5820 केऔरऔर भी

रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) में आई करीब तीन फीसदी की गिरावट ने बाजार को थोड़ा दबाकर रख दिया। फिर भी चुनिंदा स्टॉक्स, खासकर बी ग्रुप के स्टॉक्स में बढ़त जारी है। गौर करने की बात यह है कि पिछले छह महीनों में दो चीजें हुई हैं। एक, जो प्रवर्तक ऊंचे मूल्यों पर भी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचने को तैयार नहीं थे, उन्हें अब समझ में आ गया है कि फंड जुटाने का सबसे सस्ता व अच्छा तरीकाऔरऔर भी

कंपनियों के नतीजों का मौसम खत्म होने को है। अब तक तस्वीर यह बनी है कि जहां इनफोसिस और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी तमाम बड़े स्तर की कंपनियां बाजार की अपेक्षाओं को पूरा करने में नाकाम रही हैं, वहीं पोलारिस, एचसीएल टेक्नो व हिंदुस्तान जिंक जैसे मध्यम स्तर की कंपनियों ने उम्मीद के बेहतर नतीजे हासिल किए हैं। कुल मिलाकर कॉरपोरेट क्षेत्र का लाभार्जन बीते वित्त वर्ष 2010-11 में पहले से 20 फीसदी ज्यादा रहेगा। लेकिन चालू वित्तऔरऔर भी

सिर्फ बाजार भाव से नहीं पता चलता है कि कोई शेयर सस्ता है या नहीं। भाव बढ़ जाने के बावजूद वह सस्ता हो सकता है या महंगा। इसका पता इससे चलता है कि उसके मूल्यांकन का स्तर क्या है। और, मूल्यांकन का पैमाना है पी/ई अनुपात। यानी, बाजार भाव को उसके सालाना ईपीएस (प्रति शेयर लाभ) से भाग देने पर निकला अनुपात। आप कहेंगे कि यह तो अलग-अलग कंपनियों की बात हुई। कंपनियों के किसी सेट काऔरऔर भी