बाजार 5200 से उठकर 5585 पर चला गया। यह बड़े राहत की बात है, तेजी का आगाज है। उम्मीद थी कि बाजार सांस लेने के लिए थोड़ा थमेगा क्योंकि यह 200 दिनों के मूविंग एवरेज (डीएमए) के काफी करीब पहुंच चुका है। लेकिन अगर यह जोश और वोल्यूम के साथ 200 डीएमए को पार कर जाता है तो 60 दिनों के भीतर 6500 की मंजिल पकड़ लेगा। इसलिए ऐसा हो, इससे पहले कुछ मुनाफावसूली लाजिमी हो गईऔरऔर भी

बजट में नए आर्थिक सुधारों के बारे में प्रधानमंत्री के दावे ने बाजार पर अपना असर दिखा दिया। यह वो मूलाधार है जिस पर सारे देश और निवेशक समुदाय को पूरा यकीन होना चाहिए। इस हकीकत के मद्देनजर बाजार को पहले तो गिरकर 5200 तक जाना ही नहीं चाहिए था। लेकिन ऐसा हुआ तो उसकी वजह चालबाजी या जोड़तोड़ है और, बाजार में जोड़-तोड़ की कोई काट तो है नहीं। मंदड़ियों का कार्टेल अकेले दम पर बाजारऔरऔर भी

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आज बुधवार को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संपादकों के साथ हुई प्रेसवार्ता में हाल में उठी हर चिंता और मुद्दों पर बेबाक राय दी है। उनकी बातों से संकेत मिलता है कि आनेवाला बजट कठोर होगा, पर लोक-लुभावन उपायों के साथ। बजट कठोर होगा प्रशासन की कमियों, कालेधन और मुद्रास्फीति जैसी समस्याओं पर, जबकि वह नरम होगा टैक्स के मोर्चे पर ताकि आम आदमी के पास मुद्रास्फीति से लड़ने के लिए ज्यादा आमदनी बचऔरऔर भी

बाजार में 800 अंकों के सुधार का मतलब यह नही है कि अंधेरा खत्म, मुसीबत टल गई। हम जैसे ही यह सोचते हैं कि सब कुछ पटरी पर आ गया है, उससे पहले ही बिकवाली का नया झोंका सब कुछ फिर से पटरा कर देता है। कल मैं एक बिनजेस चैनल पर कार्यक्रम देख रहा था जहां कुछ ज्ञानी लोग एक सर्वेक्षण पर बहस कर रहे थे जिसका निष्कर्ष यह था कि देश के 97 फीसदी लोगऔरऔर भी

शेयर बाजार और क्रिकेट के मैच ज्यादातर हमेशा फिक्स होते हैं। हालांकि छोटी-मोटी अवधि में अनजाने कारकों के चलते बाजार अक्सर चौंकाता भी है। यह बात मनगढ़ंत नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। 2006 और 2007 में देश में मुद्रास्फीति की स्थिति इससे भी खराब थी। फिर भी 2007 में बाजार ने 21,300 का नया शिखर बनाया। इसलिए अगर आज विद्वान लोग मुद्रास्फीति और ब्याज दरें बढ़ने की चिंता को भारतीय इक्विटी बाजार की गिरावट कीऔरऔर भी

शेयर बाजार में मची घबराहट व अफरातफरी के इस आलम हर कोई तम्बू समेटने और हिसाब-किताब दुरुस्त करने में लगा है। ब्रोकरेज हाउस अपने ग्राहकों से जबरदस्ती पूरी रकम निकालने लगे हैं। बल्कि, मुझे तो कुछ लोगों ने बताया कि हैदराबाद की किसी कंपनी के प्रवर्तक को एक प्रमुख ब्रोकिंग हाउस ने एयरपोर्ट से ही उठा लिया क्योंकि उसने उस ब्रोकरेज हाउस से अपना हिसाब-किताब नहीं निपटाया था। चेन्नई के एक प्रमुख अखबार ने खबर दी हैऔरऔर भी

निफ्टी टूटकर 5225 और सेंसेक्स 17508 तक चला गया। लेकिन मुझे जरा-सा भी गफलत नहीं है। मंदड़िये अपने हमले से बाजार का रुख बदल सकते हैं, मेरी राय नहीं। हालांकि मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं कि अब बाजार की नई तलहटी बनाने का काम मंदड़िये करेंगे क्योंकि इस समय सब कुछ उनके हाथ, उनके शिकंजे में है। इस बीच एलआईसी ने बाजार में खरीद शुरू कर दी है और अगले 30 दिनों में वह 15,000औरऔर भी

बार-बार पलटकर हमला करना मंदड़ियों और तेजड़ियों दोनों की फितरत है। तेजड़िये तीन से चार बार बाजार को ऊपर की तरफ खींचते हैं। लेकिन खरीद से ज्यादा सप्लाई होते ही कदम पीछे खींच लेते हैं। मंदड़ियों का हमला और पीछे हटना भी इसी तरह चलता है। अभी तक मंदड़िये कामयाब रहे हैं क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता, मुद्रास्फीति, घोटाले, भ्रष्टाचार और अधिक मूल्यांकन ने उनके लिए माकूल हालात पैदा कर रखे थे। हालांकि मंदड़ियों की कोशिश बदस्तूर जारी है।औरऔर भी

जब बाजार मूलभूत या फंडामेंटल स्तर पर मजबूत हो, तब मंदड़ियों की फांस की अंतहीन चर्चा करते रहने का कोई तुक नहीं है। मंदड़िये इस समय उसी तरह शॉर्ट सौदे किए बैठे हैं, जिस तरह उन्होंने लेहमान संकट के बाद कर रखा था। एक मंदड़िये ने उस संकट के दौरान बाजार से 4800 करोड़ रुपए बनाए थे और 450 करोड़ रुपए का एडवांस टैक्स भरा। लेकिन जब बाजार का रुख पलटा तो सब कुछ गंवा बैठा। इतिहासऔरऔर भी

मैंने कल लिखा था कि वे निफ्टी में 5500 का स्तर तोड़ने की कोशिश करेंगे और 5550 के ऊपर पहुंच जाने पर कवरिंग शुरू कर देंगे। सारा कुछ ऐसा ही हो रहा है। मैंने अब कई फंड मैनेजरों को कहते हुए सुना है कि भारत को अंडर-परफॉर्म नहीं करना चाहिए था। मैं अगर वित्त मंत्री होता तो उनको दिखा देता कि भारत कैसे अपने बाजार पर उनके दबदबे को ठुकरा सकता है। मेरे सूत्रों का कहना हैऔरऔर भी