जिस तरह ड्रग-एडिक्ट नशे के बिना पसीना-पसीना हो जाता है, उसी तरह हम भी धन और घर की चक्की के ऐसे आदी हो जाते हैं कि उसके बिना सब सूना लगने लगता है। फुरसत हमें काटने दौड़ती है और हम उसी चक्की की ओर दौड़े चले जाते हैं।और भीऔर भी

हम सही सवाल पूछना शुरू कर दें तो समझिए कि सच तक पहुंचने की हमारी आधी यात्रा पूरी हो गई। लेकिन हम तो ‘होता है, चलता है’ की सोच के ऐसे आदी हो गए हैं कि चौंकते ही नहीं, सवाल ही नहीं पूछते।और भीऔर भी

हम घरों के कोने-अँतरों में छोटी-बड़ी तमाम चीजों को बचाकर रखने के आदी हो गए हैं। सोचते हैं कि क्या पता, कभी काम आ जाए, जबकि सोचना चाहिए कि क्या इसके बिना हमारा काम चल सकता है।और भीऔर भी

हम सभी बचपन से लेकर बड़े होने तक सुरक्षा के आदी हो जाते हैं। बचपन में मां-बाप की सुरक्षा, बड़े होने पर नौकरी की सुरक्षा। लेकिन बहुत सारी अनुभूतियां सुरक्षा का दायरा तोड़े बिना नहीं मिलतीं और हम अधूरे रह जाते हैं।और भीऔर भी