ग्रीस की खराब आर्थिक हालात के कारण पूरा यूरोप चिंतित है। भारत में महंगाई की स्थिति खराब चल रही है। इन हालात में बदनाम पी-नोट्स (पार्टिसिपेटरी नोट्स) के जरिए भारतीय शेयर बाजार में एक बार फिर बड़े पैमाने पर निवेश शुरू हो गया है। विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के कुल निवेश में पी-नोट्स की हिस्सेदारी मई महीने में 19.5 फीसदी तक पहुंच चुकी थी। सेबी के मुताबिक अप्रैल में यह आंकड़ा 15 फीसदी ही था। हालांकि यहऔरऔर भी

भारत ने दुनिया के 79 देशों के साथ दोहरा कराधान बचाव संधि (डीटीएए) कर रखी है। इसमें मॉरीशस व स्विटजरलैंड शामिल हैं। संधि के तहत कंपनी का मूल पता जिस देश का है, वहीं उस पर कैपिटल गेन्स टैक्स लग सकता है। जहां से उसने कमाया है, वहां पर नहीं। हालांकि लाभांश, रॉयल्टी व ब्याज आय पर दोनों ही देशों में टैक्स लगता है। लेकिन टैक्स की दर लाभांश पर 7.5% और ब्याज व रॉयल्टी पर 10%औरऔर भी

देश की अर्थव्यवस्था में बढ़ रहे कालेधन के प्रवाह को लेकर चिंतित आयकर विभाग ने स्विटजरलैंड, वर्जिन आइलैंड और बहामास जैसे कर चोरी के पनाहगाह देशों की यात्रा करने वाले लोगों पर पैनी नजर रखनी शुरू कर दी है। विभाग ने अपने खुफिया व जांच अधिकारियों को ऐसे सभी यात्रियों के बारे में पड़ताल करने का निर्देश दिया है जिन्होंने पिछले साल कर चोरी के पनाहगाह बने देशों की यात्रा की और ऐसे दौरों पर हुए खर्चऔरऔर भी

जूपिटर बायोसाइंसेज दवा उद्योग व बायोटेक्नोलॉजी से जुड़ी 1985 में बनी कंपनी है। बहुत कुछ नायाब बनाती है। लगातार बढ़ रही है। अधिग्रहण भी करती है। हाथ भी मिलाती है। 2006 में हैदराबाद की कंपनी का अधिग्रहण किया तो 2008 में स्विटजरलैंड की एक उत्पादन इकाई खरीद डाली। 2007 में रैनबैक्सी के साथ रणनीतिक गठजोड़ किया। इस मायने में भी यह बड़ी विचित्र कंपनी है कि इसकी 62.43 करोड़ रुपए की इक्विटी में प्रवर्तकों की हिस्सेदारी मात्रऔरऔर भी

भारत ने छह सालों से भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संधि को हस्ताक्षर करने के बावजूद लटका रखा है, यह बात मीडिया में उजागर होते ही वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी बचाव की मुद्रा में आ गए हैं। सोमवार को चुनाव प्रचार के दौरान कोलकाता मे उन्होंने मीडिया को बताया कि भारत जल्दी 2005 में हस्ताक्षर की गई इस संधि का अनुमोदन कर देगा। इस बीच चुनावी माहौल के बीच वित्त मंत्री मुखर्जी बीजेपी पर बढ़-चढ़कर हल्ला बोलतेऔरऔर भी

भारत को स्विस बैंक खातों में रखे गए काले धन के बारे में सूचना हासिल करने के लिए इस साल के अंत तक इंतजार करना पड़ेगा क्योंकि स्विटजरलैंड की संसद पिछले साल अगस्त में भारत के साथ हुई संधि को दिसंबर तक ही मंजूरी दे सकेगी। भारत और स्विटजरलैंड ने सूचनाओं का आदान प्रदान करने की सुविधा के साथ दोहरा कराधान बचाव संधि (डीटीएए) में संशोधन के समझौते पर 30 अगस्त, 2010 को हस्ताक्षर किए थे। स्विटजरलैंडऔरऔर भी

नोवार्टिस फार्मा क्षेत्र की बहुराष्ट्रीय कंपनी है। इंसानों से लेकर जानवरों तक की दवाएं बनाती है। 1996 में सीबा-गेगी और सैंडोज के विलय के बाद वजूद में आई। इसका मुख्यालय स्विटजरलैंड के शहर बासेल में है। अभी कल ही मशहूर फॉर्च्यून पत्रिका में इसे दवा कारोबार में दुनिया की सबसे पसंदीदा कंपनियों में पहले नंबर पर रखा है। लेकिन इसकी भारतीय इकाई नोवार्टिस इंडिया के शेयरों पर खास चमक नहीं आई। कारण वाजिब भी लगता है क्योंकिऔरऔर भी

स्विटजरलैंड का कहना है कि उसे करचोरों की पनाहगार समझना उचित नहीं है और वह भारत के साथ आयकर मामलों में सहयोग की नई संधि को इस साल मंजूरी मिल जाने के बाद कालेधन के खिलाफ कार्रवाई में उसको प्रशासनिक सहयोग दे सकेगा। स्विटजरलैंड के वित्त विभाग के मंत्री माइकल एमबल ने शनिवार को दावोस में वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम के समारोह से बाहर भारत के एक निजी समाचार चैनल के साथ एक साक्षात्कार में कहा, ‘‘हमने हालऔरऔर भी