सत्ता और संत
जिस समाज में जितनी ज्यादा असुरक्षा होती है, वहां सत्ता की उतनी ही भूख और संतों का उतना ही निरादर होता है। लोग सत्ता के पीछे भागते हैं। संत तक संतई छोड़ सत्ता की जोड़-तोड़ में लग जाते हैं।और भीऔर भी
जिस समाज में जितनी ज्यादा असुरक्षा होती है, वहां सत्ता की उतनी ही भूख और संतों का उतना ही निरादर होता है। लोग सत्ता के पीछे भागते हैं। संत तक संतई छोड़ सत्ता की जोड़-तोड़ में लग जाते हैं।और भीऔर भी
प्रकृति से कैसे निपटना है, यह तो हर जीव की तरह हम मां के पेट से सीखकर आते हैं। समाज से निपटने की शुरुआती सीख हमें घर-परिवार, स्कूल व परिवेश से मिलती है। फिर जंग में हम अकेले होते हैं।और भीऔर भी
समाज में हमेशा ज्यादातर लोग संतुष्ट रहते हैं या संतोषम् परम सुखम् का जाप करते हैं। कुछ ही लोग होते हैं जो असंतुष्ट रहते हैं। दुनिया को जीने के लिए बेहतर जगह बनाने का काम इन्हीं का होता है।और भीऔर भी
अगर कोई व्यक्ति, संस्था या समाज समस्याओं से जूझने के बजाय उनके साथ रहना सीख लेता है तो उसका विकास अवरुद्ध हो जाता है। समस्याएं तो दरवाजे हैं जिन्हें खोलने पर नई राहें निकलती हैं।और भीऔर भी
निष्काम कर्म जैसा कुछ नहीं होता। हर काम के पीछे किसी न किसी फल की कामना होती है। काम में छल तब पैदा होता है जब पेड़ लगाने का मकसद फल नहीं, कुछ और होता है। यह समाज की देन है।और भीऔर भी
प्रकृति ने हर इंसान को मौलिक बनाया है। एक ही मां-बाप की संतानों में जीन्स का भिन्न समुच्चय। फिर भी अनुकृतियों से भरा समाज! दोष किसका? थोड़ा हमारा तो बहुत सारा जीने की शर्तों का।और भीऔर भी
हर जीव सृजन के लिए एकाकीपन और बचाव के लिए झुंड का इस्तेमाल करता है। इंसान भी इससे अलग नहीं है। बस, समाज बन जाने से फर्क यह पड़ा है कि अच्छी टीम इंसान के सृजन को निखार देती है।और भीऔर भी
सिर्फ अपने या अपनों के लिए कमाने से नौकरी होती है, बरक्कत नहीं होती। बरक्कत तब होती है, दौलत तब बरसती है, जब आप किसी सामाजिक संगठन, संस्था या कंपनी के लिए कमाते हो।और भीऔर भी
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