पत्थर में न तो इच्छा होती है और न द्वेष। उसे न सुख होता है, न दुख। न ही पत्थर अपना रूप बनाए रखना चाहता है, जबकि ये अनुभूतियां ही प्राणियों की पहचान और उनके जीवन का मूल तत्व हैं।और भीऔर भी

सिर में पड़नेवाली जूं के कपड़ों व शरीर में पहुंचने की प्रक्रिया का अध्ययन कर रहे अमेरिकी वैज्ञानिकों को इस बात के प्रमाण मिले कि एक लाख सत्तर हजार साल पहले पहली बार मानव ने कपड़े पहनना शुरू किया था। अपनी गणना के लिए वैज्ञानिकों ने डीएनए मैपिंग का सहारा लिया। वे इसका पता लगा रहे थे कि मानव ने ठीक ठीक कब से कपड़े पहनने शुरू किए। इसी दौरान उन्होंने पाया कि कपड़ों में रहने वालीऔरऔर भी

निरंतर नए ऑरबिट में जाने की कोशिश करना इंसान का मूल स्वभाव है। इसलिए हम रूटीन से ऊब जाते हैं। लेकिन नए ऑरबिट में जाकर भी नए चक्र में बंधना पड़ता है। चक्र के इस चक्कर से मुक्ति नहीं।और भीऔर भी

सोने पर चेतना गायब और जगने पर वापस! बीच में जाती कहां है? कहीं नहीं। मानव मस्तिष्क में अरबों न्यूरॉन हैं जिनके बीच खरबों तार है। वे बराबर बतकही करते हैं। हमारे सोने पर चुपके से बतियाते हैं।और भीऔर भी

ठगों से भरी बस्ती में किसी पर विश्वास करना घातक है। तो क्यों न बस्ती ही बदल दी जाए? ऐसा संभव है क्योंकि सहज विश्वास मूल मानव स्वभाव है, जबकि ठगी समाज की देन है। और, समाज को बदला जा सकता है।और भीऔर भी