दौड़ती है जिंदगी
हर काम हर पल दुनिया में कहीं न कहीं होता रहता है। जीना-मरना, हंसना-रोना, मिलना-बिछुड़ना। अंतहीन छोरों से बंधी डोर उठती है, गिरती है। झूले या सांप नहीं, सागर की लहरों की तरह दौड़ती है जिंदगी।और भीऔर भी
हर काम हर पल दुनिया में कहीं न कहीं होता रहता है। जीना-मरना, हंसना-रोना, मिलना-बिछुड़ना। अंतहीन छोरों से बंधी डोर उठती है, गिरती है। झूले या सांप नहीं, सागर की लहरों की तरह दौड़ती है जिंदगी।और भीऔर भी
कहने को कोई कुछ भी कहे, लेकिन बिरले लोग ही औरों के लिए जीते हैं। बाकी ज्यादातर लोग तो अपने या अपनों के लिए ही जीते हैं। वे दूसरों के लिए तभी काम करते हैं, जब उसमें उनका फायदा होता है।और भीऔर भी
एक बात गांठ बांध लें कि इस दुनिया में सबकी जगह है। लेकिन हर जगह सबकी नहीं है। इसलिए हर कामयाब आदमी को देखकर उसके जैसा बनने की तमन्ना न अच्छी होती है और न ही व्यावहारिक।और भीऔर भी
समाज में हमेशा ज्यादातर लोग संतुष्ट रहते हैं या संतोषम् परम सुखम् का जाप करते हैं। कुछ ही लोग होते हैं जो असंतुष्ट रहते हैं। दुनिया को जीने के लिए बेहतर जगह बनाने का काम इन्हीं का होता है।और भीऔर भी
सरकार ने दालों के निर्यात पर लगी पाबंदी और एक साल के लिए बढ़ा दी है। मौजूदा रोक की अवधि 31 मार्च 2011 को खत्म हो रही थी। लेकिन अब इसे 31 मार्च 2012 तक बढ़ा दिया गया है। विदेश व्यापार महानिदेशालय ने बुधवार को जारी एक अधिसूचना में कहा है, “दालों के निर्यात पर प्रतिबंध की मीयाद 31 मार्च 2012 तक बढ़ा दी गई है।” लेकिन यह रोक काबुली चने के निर्यात पर नहीं लागू होगी।औरऔर भी
दुनिया में ऐसा कुछ नहीं जो किसी न किसी को पता न हो या उसे जानने की कोशिश न चल रही हो। सबको सब पता रहे, जरूरी नहीं। लेकिन ज़िंदगी का दायरा जितना बड़ा हो, उतना तो जानना जरूरी है।और भीऔर भी
जब आप खास होते हो तो लोग आपको देखते हैं। लेकिन जब आम होते हो तो आप सबको देखते हो। इसलिए जिन्हें भी दुनिया को सही से देखना-समझना है, उनके लिए आम बने रहना ही ज्यादा अच्छा।और भीऔर भी
जब हमें यह लगने लगे कि इस दुनिया में हमारे लिए कोई नहीं है तो हमें यह सोचना शुरू कर देना चाहिए कि हम सबके लिए हैं। फिर एक दिन किसी से न जुड़ते हुए भी हम सबसे जुड़ जाते हैं।और भीऔर भी
गमले में पौधे और बोनसाई ही उगते हैं, पेड़ नहीं। इसी तरह विचार व्यवहार की आंधियों में पलते हैं, बंद कोटरों में नहीं। दुनिया के झंझावातों में निखरते हैं, इतिहास के थपेड़ों से संवरते हैं विचार।और भीऔर भी
कोटरों में दाने बीनती दुनिया। व्यक्ति की निजी दुनिया। व्यक्तियों से समाज, समाजों से देश और देशों से बनी दुनिया। हर किसी को मुकम्मल जहां मिल जाता तो इस तरह नहीं बनती दुनिया।और भीऔर भी
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