हम व्यक्ति या वस्तु को जानकर नहीं, मानकर चलते हैं। परखने से पहले ही उन्हें किसी खांचे में कस लेते हैं और उसके हिसाब से अपेक्षाएं पाल लेते हैं। ऐसे में धोखा खाते हैं तो इसमें दोष हमारा भी है।और भीऔर भी

प्रतिभा को साहस और बहादुरी का साथ न मिले तो वह कभी खिल ही नहीं सकती। डर-डर कर जीनेवाला दुनियादार हो सकता है, प्रतिभाशाली नहीं। प्रतिभा तो हमेशा लीक से हटकर, खांचे को तोड़कर चलती है।और भीऔर भी

विचार यूं तो अजगर की तरह अलहदी होते हैं। उन्हें करवट बदलने में ठीकठाक वक्त लगता है। स्थितियां बदलने पर भी पुराने खांचे में बंधे रहते हैं। लेकिन बदलते हैं तो ड्रैगन की तरह हाहाकारी हो जाते हैं।और भीऔर भी