इक्कीस साल एक महीने पहले सितंबर 1990 से देश में बैंकों की ब्याज दरों को बाजार शक्तियों या आपसी होड़ के हवाले छोड़ देने का जो सिलसिला हुआ था, वह शुक्रवार 25 अक्टूबर 2011 को रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति की दूसरी तिमाही समीक्षा के साथ पूरा हो गया। रिजर्व बैंक के गवर्नर दुव्वरि सुब्बाराव ने ऐलान किया, “अब वक्त आ गया है कि आगे बढ़कर रुपए में ब्याज दर को विनियंत्रित करने की प्रकिया पूरी कर दी जाए।”
करीब साल भर पहले 1 जुलाई 2010 से बेस रेट प्रणाली लागू करते वक्त दो लाख रुपए तक के ऋणों पर ब्याज दर को मुक्त किया गया था। इसके बाद केवल बैंकों के बचत खाते की ब्याज दर ही थी जिसे रिजर्व बैंक तय करता था। लेकिन अब तत्काल प्रभाव से उसे भी मुक्त कर दिया गया है।
आज की तारीख से देश का हर बैंक बचत खाते पर मनमाफिक ब्याज दर तय कर सकता है। रिजर्व बैंक ने इस साल 3 मई 2011 से बचत खातों पर ब्याज की दर 4 फीसदी कर दी थी। इससे पहले यह दर 1 मार्च 2003 से तब तक 3.5 फीसदी पर अटकी हुई थी। उससे भी पहले 24 अप्रैल 1992 से लेकर तब तक बचत खाते पर ब्याज की दर 6 फीसदी सालाना थी। अब इस ब्याज पर रिजर्व बैंक की कोई बंदिश नहीं रहेगी। हां, इतना जरूर है कि हर बैंक को बचत खाते में एक लाख रुपए रुपए तक की जमा पर एकसमान ब्याज देना होगा। उसके ऊपर की जमा पर वे कितना भी ब्याज दे सकते हैं। लेकिन किसी भी ग्राहक में भेदभाव नहीं किया जा सकता। यानी, ऐसा नहीं हो सकता कि पीटर डिसूजा को तीन लाख रुपए की जमा पर 9 फीसदी ब्याज मिले और कुंवर प्रताप सिंह को तीन लाख रुपए पर 6 फीसदी ही ब्याज दिया जाए।
रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति की दूसरी त्रैमासिक समीक्षा में इस ऐतिहासिक कदम की घोषणा की है। देश से सबसे बड़े बैंक एसबीआई के चेयरमैन प्रतीप चौधरी ने कहा है कि उनका बैंक बचत खाते की ब्याज दर को फिलहाल 4 फीसदी पर यथावत रखेगा। वहीं, निजी क्षेत्र के तेजी से उभरते यस बैंक के प्रबंध निदेशक व सीईओ राणा कपूर का कहना है कि पिछले बीस सालों में देश के बैंकिंग उद्योग के लिए यह सबसे बड़ा फैसला है। बता दें कि इस समय बैंकों की जमा का करीब 22 फीसदी हिस्सा बचत खातों से आता है, जबकि लोगबाग औसतन अपनी कुल बचत का 13 फीसदी हिस्सा बचत खातों में रखते हैं।
असल में चालू खाता और बचत खाता (कासा) बैंकों के लिए धन का सबसे सस्ता स्रोत रहा है। जहां बचत खाते पर उन्हें 4 फीसदी ही ब्याज देना पड़ता था, वहीं एफडी पर वे 11 फीसदी तक ब्याज देते हैं। चालू खाते पर तो अब भी उन्हें कोई ब्याज नहीं देना होगा। लेकिन लोगों की बचत को खींचने के लिए अब बैंकों में ग्राहक को ज्यादा ब्याज देने की होड़ मच जाएगी। इससे आखिरकार ग्राहक को ही फायदा होगा। रिजर्व बैंक ने जब इस दर से नियंत्रण हटाने के लिए नंवबर 2010 में एक बहस पत्र जारी किया था, तब बैंकों ने इस पर खूब हायतौबा मचाई थी।
उसके बाद इस साल अप्रैल में इसे अंतिम रूप से जनता की प्रतिक्रिया के लिए पेश किया गया। इस तरह पूरी तैयारी के बाद ही रिजर्व बैंक ने यह ऐतिहासिक फैसला लागू किया है। इस क्रम में करीब डेढ़ साल पहले 1 अप्रैल 2010 से बचत पर ब्याज की गणना हर दिन के बैलेंस के हिसाब के किए जाने का नियम लागू किया गया था। नहीं तो इससे पहले बैंक महीने में खाते की सबसे कम जमा पर ही ब्याज देते थे।
इस कदम से यकीनन बैंकों के लिए धन की लागत बढ़ जाएगी। इसी अहसास के चलते शुक्रवार को प्रमुख बैंकों – एसबीआई, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, पंजाब नेशनल बैंक व इलाहाबाद बैंक के शेयरों में 2 से 6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि आईडीबीआई और आईसीआईसीआई बैंकों के शेयर बढ़कर बंद हुए हैं। कुल मिलाकर बैंक निफ्टी में 1.41 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन व रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर सी रंगराजन ने बचत खाते की ब्याज दरों के नियंत्रण-मुक्त करने को सही दिशा में उठाया गया कदम बताया है। उनका कहना है कि अब बचत खाते की ब्याज दर बैंकों की लागत से प्रभावित होगी। इन दरों का बढ़ना लगभग तय है।
इंडसइंड बैंक के वैश्विक बाजार समूह के प्रमुख मोजेज हार्डिंग का कहना है कि इससे निश्चित रूप से कासा जमा की वृद्धि को बनाए रखने के लिए बैंकों को अब पहले से ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। आईडीबीआई बैंक के कार्यकारी निदेशक आर के बंसल का कहना है कि उन्हें लगता है कि अब बचत खाते पर ब्याज की दर बढ़कर 6 फीसदी हो जाएगी। उनके मुताबिक कुल जमा में बचत खाते की कम हिस्सेदारी वाले बैंकों के मार्जिन में 0.10 से लेकर 0.20 फीसदी की कमी आ जाएगी, जबकि ज्यादा हिस्सेदारी वाले बैंकों का मार्जिन 0.40 से 0.50 फीसदी तक घट जाएगा।
