न खुदा ही मिला, न बिसाले सनम, बजट में न दिशा, न ही लोकप्रियता

यह बजट किसके लिए है? आम के लिए, खास के लिए या बाजार के लिए! अगर प्रतिक्रियाओं के लिहाज से देखा जाए तो इनमें से किसी के लिए भी नहीं। आम आदमी परेशान हैं कि उसे बमुश्किल से मुद्रास्फीति की मार के बराबर कर रियायत मिली है। खास लोगों को कहना था कि वित्त मंत्री को राजकोषीय मजबूती के लिए जो ठोस उपाय करने थे, वैसा कोई भी साहसिक कदम उन्होंने नहीं उठाया है। उन्होंने दस में से वित्त मंत्री को मात्र चार अंक दिए हैं।

जहां तक बाजार की बात है तो वह बड़ी साफगोई से अपना जवाब दे देता है। उम्मीदों के साथ शुरू हुआ बाजार शाम को बंद हुआ तो बीएसई सेंसेक्स 1.19 फीसदी नीचे 17,466.20 पर था और एनएसई निफ्टी 1.19 फीसदी नीचे 5317.90 अंक पर। बांड बाजार में भी सरकारी उधारी का भय नजर आया। बांडों की भरमार होगी तो दस साल के सरकारी बांड सस्ते हो गए और उन पर यील्ड की दर छह आधार अंक (0.06%) बढ़कर 8.42 फीसदी हो गई है। यह पिछले ढाई महीनों की सबसे ऊंची यील्ड है।

फिर क्या यह किसानों का बजट है? इसका रुझान लोकलुभावन है? आईसीआईसीआई सिक्यूरिटीज प्राइमरी डीलरशिप में कार्यरत अर्थशास्त्री ए. प्रसन्ना कहते हैं, “मुझे इस बजट में कोई लोकलुभावन स्कीम नहीं नजर आती। लेकिन यह आर्थिक सुधारों को लानेवाला बजट भी नहीं है। इसमें तो बस यथास्थिति को बनाए रखा गया है।”

सच है कि बजट में कुछ भी चौंकानेवाला नहीं था। विनिवेश का लक्ष्य जो पहले से पता था, वहीं 30,000 करोड़ रुपए रखा गया। व्यक्तिगत आयकर छूट की सीमा दो लाख रुपए होनी थी तो हो गई। राजकोषीय घाटे को बढ़ना था तो वह जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) 4.6 फीसदी के लक्ष्य को तोड़कर सीधे 5.9 फीसदी पर पहुंच गया। अगले वित्त वर्ष के लिए हर कोई मान रहा था कि इसे जीडीपी के 5 फीसदी तक रखा जा सकता है तो इसे 5.1 फीसदी रख दिया गया। अगर सरकार इस लक्ष्य को हासिल भी कर लेती है तो राजकोषीय घाटे का यह स्तर ब्रिक्स के बाकी देशों (ब्राजील, रूस, चीन व दक्षिण कोरिया) से ज्यादा रहेगा।

पता था कि किसी समय वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान उद्योग-धंधों को एक्साइज और सर्विस टैक्स में जो दो फीसदी छूट दी गई थी, उसे वापस ले लिया जाएगा। ऐसा ही हुआ। एक्साइज ड्यूटी फिर से 12 फीसदी और सर्विस टैक्स फिर से 12 फीसदी कर दिया गया। प्रसन्ना कहते हैं कि शायद राजनीतिक मजबूरियों के चलते वित्त मंत्री ने बगैर कोई जोखिम उठाए सुरक्षित चलने का फैसला किया हो। लेकिन वित्त मंत्री ने खुद एक बिजनेस चैनल को दिए गए इंटरव्य़ू में माना है कि 1994 के बाद से जनता ने केंद्र में किसी भी पार्टी को स्पष्ट जनादेश नहीं दिया है तो इस समय उनके सामने कोई अनोखी परिस्थिति नहीं है।

विपक्ष और जनता की तरफ से कालेधन पर हल्ला मच रहा था तो इस पर श्वेत पत्र लाने की बात कहकर प्रणब मुखर्जी ने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली। सब्सिडी घटाने का खास दवाब था तो कह डाला कि इस साल सब्सिडी को घटाकर जीडीपी के 2 फीसदी पर ले आया जाएगा। अभी यह 2.5 फीसदी है। अगले वित्त वर्ष 2013-14 में इसे और घटाकर जीडीपी के 1.7 फीसदी पर ले आएंगे। कहने में किसी के बाप का क्या जाता है? अंतरराष्ट्रीय निवेश फर्म नोमुरा सिक्यूरिटीज का कहना है कि वित्त मंत्री ने इसके लिए कोई ठोस कदम नहीं घोषित किए हैं। इसलिए इस लक्ष्य का पूरा होना कतई संभव नहीं है और 2012-13 में सब्सिडी का अनुपात जीडीपी के 2 फीसदी लक्ष्य से बहुत ऊपर रह सकता है।

वित्त मंत्री के बजट भाषण के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि सरकार को आखिरकार बिल्ली के गले में घंटी बांधनी ही पड़ेगी और गठबंधन के सहयोगी दलों के परेशान होने के बावजूद सब्सिडी को खत्म करने के लिए कीमतें बढ़ानी पड़ेंगी। राजनीति की बिसात पर पैदे की औकात रखनेवाले, नाम के सरदार मनमोहन सिंह के इस दावे पर कोई चाहे भी तो यकीन नहीं कर सकता।

वित्त मंत्री ने नए साल में राजकोषीय घाटे का अनुमान 5,13,590 करोड़ रुपए रखा है। इसमें से 4.79 लाख करोड़ रुपए बाजार से उधार जुटाकर पूरा करने का लक्ष्य है। चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे का बजट अनुमान 4,12,817 करोड़ रुपए था। संशोधित अनुमान 5,21,980 करोड़ रुपए का निकला जिसमें से 5.10 लाख करोड़ रुपए बाजार उधारी से जुटाए गए। इसलिए नए साल में सरकार की वास्तविक बाजार उधारी का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। नतीजतन, सरकारी बांडों पर यील्ड की दर अभी से बढ़ गई है।

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