मिलिए! ट्रेडिंग की जंग के योद्धाओं से

यूं तो अनजान या कम जानकार निवेशकों के लिए शेयर बाज़ार में लंबे समय का ही निवेश करना चाहिए जिसके लिए ‘तथास्तु’ आपकी अपनी भाषा में उपलब्ध इकलौती और सबसे भरोसेमंद सेवा है। फिर भी अगर आपने ट्रेडिंग का मन बना ही लिया है तो आप सबसे पहले यह समझ लीजिए कि आप जैसी और आपसे ठीक उलट राय रखने वाले लाखों लोग सामने मैदान में डटे हैं। उन्हें भी अपना धन और मुनाफा उतना ही प्यारा है, जितना आपको। वे आपसे छीनना चाहते हैं और आप उनसे।

आप सोचते हैं कि शेयर बढ़ेगा और उसे अभी खरीदकर बाद में बेचकर कमा लेंगे। सामनेवाले को लगता है कि यह शेयर तो गिरनेवाला है। इसलिए इसे बेचकर निकल लो। नहीं तो बाद में गले की फांस बन जाएगा। तमाम समझदार ट्रेडर तो शॉर्ट सेल से कमाई करते हैं। ज्यादा भाव पर बेचते हैं और कम भाव पर खरीदकर डिलीवरी दे देते हैं। लेकिन ध्यान रहें कि ऐसा फ्यूचर्स और ऑप्शंस की सूची में शामिल शेयरों में ही किया जा सकता है जिनकी कुल संख्या मात्र 138 है जबकि बीएसई व एनएसई में आमतौर पर हर दिन ट्रेड होनेवाले स्टॉक्स की संख्या 2500 से ज्यादा है।

अगर आप इंट्रा-डे ट्रेडर हैं तो आपको यह जानकर खुशी व आश्चर्य हो सकता है और दुख व अफसोस भी कि यहां आपके सामने केवल रिटेल निवेशक ही होते हैं। किसी भी संस्थागत निवेशक को डे-ट्रेडिंग की इजाजत नहीं है। हमारी पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी के नियमों के मुताबिक, “Day trading refers to buying and selling of securities within the same trading day such that all positions will be closed before the market close of the trading day. In the Indian securities market only retail investors are allowed to day trade.

सेबी का नियम यह भी साफ करता है कि, “No institutional investor shall be allowed to do day trading i.e. square-off their transactions intra-day. In other words, all transactions would be grossed for institutional investors at the custodians’ level and the institutions would be required to fulfil their obligations on a gross basis.” ये दोनों ही वाक्य मैंने सेबी की बेवसाइट से लिए हैं। इन्हें गूगल सर्च में डालकर आप इनकी सत्यता की पुष्टि कर सकते हैं।

इस तरह इंट्रा-डे ट्रेडिंग में आपके सामने संस्थागत निवेशक नहीं हो सकते हैं। फिर कौन है आपके सामने? ब्रोकर या जॉबर। ये कभी भी अपने पैर में कुल्हाड़ी नहीं मार सकते हैं। इसलिए उनकी सलाहों पर इंट्रा-डे सौदे करना आत्मघाती है। सवाल यह भी उठता है कि जब इंट्रा-डे ट्रेडिंग सबसे ज्यादा रिस्की है और रिटेल निवेशक सबसे ज्यादा अज्ञानी, मूर्ख और बालक किस्म का होता है तो निवेशकों की सुरक्षा का दम भरनेवाली हमारी नियामक संस्था सेबी और सरकार ने इंट्रा-डे की आग में अकेले रिटेल निवेशकों को ही क्यों झोंक रखा है?

इस सवाल पर व्यापक विमर्श की जरूरत है। हालांकि सेबी के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि हमने ये नियम सेकंडरी मार्केट से संबंधित विशेषज्ञों की रिपोर्ट पर व्यापक चर्चा के बाद बनाए हैं। संस्थागत निवेशक दूर हैं तो अच्छा ही है। इससे रिटेल निवेशकों को एक लेवल प्लेइंग फील्ड मिल गया है। लेकिन अहम मसला तो यही है कि जो निवेश व ट्रेडिंग के मामले में एकदम बच्चे हैं, पूरी तरह कच्चे हैं, उन्हें इंट्रा-डे की इजाजत दी ही क्यों गई है? बैन तो उन पर लगाना चाहिए था कि वे डे-ट्रेडिंग नहीं कर सकते। लेकिन बचाया गया है संस्थागत निवेशकों को।

किसी भी जानकार से पूछ लीजिए। वो ईमानदार होगा तो यही बताएगा कि स्विंग ट्रेड, मोमेंटम ट्रेड या पोजिशनल ट्रेड में आठ-दस साल महारत हासिल कर लेने के बाद ही कोई यह स्तर हासिल कर सकता है कि वो इंट्रा-डे में कमाई कर सके। यही वजह है कि 99 फीसदी इंट्रा-डे ट्रेडर सिर्फ और सिर्फ नुकसान ही उठाते हैं। जो एक फीसदी मुनाफा कमाते हैं, उनके साथ भी अचानक किसी दिन ऐसा हो जाता है कि सालों-साल की कमाई स्वाहा हो जाती है। हमारा तो मानना है कि जिस तरह संस्थागत निवेशकों पर पाबंदी है कि वे इंट्रा-डे ट्रेड नहीं कर सकते, उसी तरह रिटेल निवेशकों के लिए भी इंट्रा-डे ट्रेडिंग को बैन कर देना चाहिए। सेबी को इतना बड़प्पन तो दिखाना ही चाहिए। इस तरह मुंह में राम, बगल में छूरी की फितरत उसे कतई शोभा नहीं देती।

अब अगर आप एक दिन के बजाय कई दिनों या महीनों की ट्रेडिंग करना चाहते हैं तो आपके सामने व्यक्तियों के अलावा दूसरे प्रमुख खिलाड़ी हैं – कंपनियों के प्रवर्तक, एचएनआई (हाई नेटवर्थ इंडीविजुअल), प्रोफेशनल निवेशक व ट्रेडर, प्राइवेट इक्विटी फंड, वेंचर कैपिटल, सिस्टम ट्रेडर, म्यूचुअल फंड, एफआईआई (विदेशी संस्थागत निवेशक), एलआईसी जैसी बीमा कंपनियां, लांगटर्म ट्रेडर, शॉर्ट टर्म ट्रेडर और इनके ऊपर से ऑपरेटर।

आपको यह भी जानकर आश्चर्य होगा कि भारतीय ट्रेडिंग में ब्रोकर खुद एक बड़ी ताकत हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) व सेबी की तरफ से हाल ही में जारी रिपोर्ट के मुताबिक साल 2010 में एनएसई में हुई कुल ट्रेडिंग में ब्रोकरों की तरफ से की गई प्रॉपराइटरी ट्रेडिंग का हिस्सा 26 फीसदी और बीएसई में 23 फीसदी था। यही नहीं, अमीरों के धन का इंतज़ाम करनेवाले पोर्टफोलियो मैनेजरों की कुल आस्तियां (एयूएम) मार्च 2011 में 2.95 लाख करोड़ रुपए थीं। जबकि मार्च 2011 तक देश में सक्रिय 41 म्यूचुअल फंडों का एयूएम 7.01 लाख करोड़ रुपए था। यानी, सारे म्यूचुअल फंडों के लाखों निवेशकों के कुल धन का लगभग 42 फीसदी हिस्सा पोर्टफोलियो मैनेजरों के पास था। इसलिए ब्रोकरों व पोर्टफोलियो मैनेजरों को भी ट्रेडिंग में सक्रिय बड़ी ताकत माना जाना चाहिए।

सोचिए। इतने धुरंधर खिलाड़ियों या महारथियों के बीच से आपको ट्रेडिंग से कमाई करनी है। इनमें से कोई भी आपकी तरह सोच का कच्चा नहीं है। ये सभी पूरी तैयारी से जंग में उतरते हैं। उनके पास पूंजी भी बड़ी होती है। लेकिन आपके पास बहुत सारी चीजें हैं जो उनके पास नहीं है। जैसे, संस्थाओं को हर दिन ट्रेड करना पड़ता है, जबकि आपके सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। कुछ बातों में वे भारी हैं तो कुछ चीजों में आप। अपनी और उनकी ताकत का सही आकलन ही आपको ट्रेडिंग के युद्ध में जीत दिला सकता है।

कमाल की बात यह है कि जो डेरिवेटिव ट्रेडिंग कैश मार्केट में हुए सौदों की हेजिंग या सुरक्षा के लिए बनाई गई थी, वह स्वतंत्र ट्रेडिंग का रूप ले चुकी है। इसमें भी फ्यूचर्स नहीं, ऑप्शंस का बोलबाला है। इसका अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि शुक्रवार, 27 सितंबर 2013 को एनएसई के डेरिवेटिव सेगमेंट में हुई कुल ट्रेडिंग 84,632.47 करोड़ रुपए की थी जिसमें से 62,000.12 करोड़ रुपए (73.25 फीसदी) की ट्रेडिंग ऑप्शंस में हुई और इसमें से भी 57,057.19 करोड़ रुपए (67.42 फीसदी डेरिवेटिव ट्रेडिंग) इंडेक्स ऑप्शंस के खाते में गई।

हमें जिस तरह का लीवरेज ऑप्शंस ट्रेडिंग में मिलता है तो हम कम लगाकर ज्यादा कमाने की लालच में उधर दौड़े चले जा रहे हैं। लेकिन हमें अंदाज़ होना चाहिए कि सामने एफआईआई घात लगाकर बैठे हैं। यहां बीमा कंपनियां या म्यूचुअल फंड जैसे डीआईआई तो नहीं हैं। लेकिन ब्रोकरों के साथ ही एचएनआई इतने शातिर हैं कि वे विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) को भी मात दे देते हैं। डेरिवेटिव सेगमेंट में एफआईआई से कहीं बड़े खिलाड़ी एचएनआई और ब्रोकर हैं। अंत में बस इतना कि युद्ध में जीतने के मंसूबे के साथ उतरे हैं तो आपके लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि आपको किस-किस से युद्ध करना है।

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