वित्त मंत्री का भरोसा, इस साल 8% रहेगी वृद्धि दर

भारतीय अर्थव्यवस्था विकास के रास्ते पर है और 2008 की मंदी के बाद पिछले दो वर्षों में अर्थव्यवस्था की औसत विकास दर आठ फीसदी रही है। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने बुधवार को न्यूयॉर्क में इंडिया इनवेस्टमेंट फोरम को संबोधित करते हुए भरोसा जताया कि इस साल भी जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की विकास दर 8 फीसदी रहेगी। अगले साल मार्च से शुरू हो रही 12वीं पंचवर्षीय योजना में जीडीपी में विकास का सालाना लक्ष्य नौ फीसदी रखा गया है।

श्री मुखर्जी ने कहा कि भारत के व्यापार, निवेश और पूंजी प्रवाह में पर्याप्त वृद्धि हुई है। वैश्वीकरण ने नए अवसर खोले हैं लेकिन इसने नई चुनौतियां भी खड़ी की हैं। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था की वार्षिक विकास दर को बढ़ाकर आठ फीसदी तक ले जाना आसान नहीं है। साथ ही उच्च विकास दर को बनाए रखना और भी कठिन है। पिछले कुछ वर्षों में विश्व स्तर पर हुई घटनाओं और उनके हमारी अर्थव्यवस्था पर असर से यह बात स्पष्ट है।

हाल के वर्षों में निरन्तर उच्च विकास से पता लगता है कि देश का आर्थिक प्रबंधन परिपक्व हो गया है। उद्योग और सेवाएं विकास के प्रमुख संवाहकों के रूप में उभरे हैं। मोटर वाहन और आटो कलपुर्जों, दवाओं, वस्त्र और इस्पात ने निर्माण क्षेत्र में विश्व स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान करीब 58 फीसदी है और यह हमारी अर्थव्यवस्था को स्थिर करने में सहायक है। विशाल सेवा क्षेत्र घरेलू परिशानियों और मानसून पर निर्भर कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़ी अनिश्चितताओं को समाहित करने में हमारी मदद कर रहा है।

उनका कहना था कि बचत और निवेश की दर पूर्वी एशिया की उच्च विकास वाली अर्थव्यवस्थाओं के समकक्ष पहुंच गई है। बचत की दर और बढ़ सकती है बशर्तें हम रोजगार के उपयोगी अवसर पैदा कर सकें। उन्होंने आशा व्यक्त की कि भारत अपने सामने मौजूद चुनौतियों के बावजूद आने वाले वर्षों में उच्च विकास दर को बनाये रखने की स्थिति में होगा।

रुपए की विनिमय दर के सवाल पर उन्होंने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक हालात पर निगाह रखे है। रिजर्व बैंक के गवर्नर साफ कह चुके है कि जरूरत होने पर केंद्रीय बैंक हस्तक्षेप करेगा। मुखर्जी ने जिक्र किया कि अंतरराष्ट्रीय माहौल विशेषकर यूरो जोन के देशों में जीडीपी की तुलना में सरकारी ऋण का उच्च अनुपात और औद्योगिक देशों की अर्थव्यवस्था में सुधार की धीमी गति चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा कि उदीयमान बाजारों में मुद्रास्फीति दबाव और मुद्रा की विनिमय दरों में उतार-चढाव गंभीर चिंता बन गया है। वैसे उन्होंने विश्वास जताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामूहिक नेतृत्व मौजूदा संकट से भी उबार लेगा जैसा कि 2008 के संकट के समय हुआ था। वित्त मंत्री मुखर्जी आईएमएफ और विश्व बैंक की सालाना बैठक में भाग लेने के लिए अमेरिका में आए हुए हैं। इसकी के साथ वे ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका) के वित्त मंत्रियों की बैठक में भी भाग लेंगे।

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