बजट में कृषि ऋण का लक्ष्य 25% बढ़ेगा

बजट में एक ऐसी घोषणा है जिसे करने के लिए सरकार के खजाने से कुछ नहीं जाता। इसके लिए वित्त मंत्री को बस अपनी छटांक भर की जुबान चलानी पड़ती है। यह है कृषि ऋण के लक्ष्य में बढ़ोतरी। पूरी उम्मीद है कि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी अगले हफ्ते शुक्रवार, 16 मार्च को 2012-13 का बजट पेश करते वक्त कृषि ऋण का लक्ष्य 25 फीसदी बढ़ा देंगे।

चालू वित्त वर्ष के लिए कृषि ऋण का बजट लक्ष्य 4.75 लाख करोड़ रुपए रखा गया था। सूत्रों के मुताबिक नए वित्त वर्ष में इसे 5.95 लाख करोड़ रुपए किया जा सकता है। इससे पहले वित्त वर्ष 2010-11 में यह 3.75 लाख करोड़ रुपए था। असल में यह लक्ष्य बैंकों, खासकर सरकारी बैंकों को पूरा करना होता है। राष्ट्रीय कृषि ग्रामीण व विकास बैंक (नाबार्ड) इसमें उनकी निगरानी और मदद दोनों करता है।

वित्त मंत्री को इसके लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं करना पड़ता है। हां, इससे उनकी कृषि और किसान समर्थक छवि जरूर बनती है। बता दें कि रिजर्व बैंक के नियमों के मुताबिक हर बैंक को कुल वितरित ऋण का 40 फीसदी हिस्सा प्राथमिकता क्षेत्र को देना होता है, जिसमें कृषि, सूक्ष्म व लघु उद्योग के साथ-साथ समाज के गरीब तबकों को दिए गए ऋण शामिल हैं। लेकिन इसमें कृषि की भूमिका सबसे अहम है। जो बैंक इस लक्ष्य को नहीं पूरा कर पाते, वे या तो क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं के ऋण खरीद लेते हैं या नाबार्ड के राष्ट्रीय विकास फंड में धन डाल देते हैं।

सबसे बड़ी दिक्कत है कि कृषि ऋणों को लौटाने की दर अच्छी नहीं है। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2009-10 में एनपीए या डूबने की हालत में पहुंच चुके कृषि ऋणों की रकम 8330 करोड़ रुपए थी। लेकिन इसके बाद 2010-11 में यह लगभग दोगुनी होकर 14,487 करोड़ रुपए पर पहुंच गई। हालांकि वित्त मंत्रालय का कहना है कि इसमें घबराने की कोई बात नहीं है क्योंकि किसान फसलों के चक्र के हिसाब से अपना कर्ज लौटाते हैं। लेकिन सरकारी बैंकों पर दबाव बना हुआ है। वे सितंबर 2011 तक ही 4.75 लाख करोड़ रुपए के कृषि ऋण लक्ष्य का आधे से ज्यादा हिस्सा पूरा कर चुके थे।

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