कारगर रहीं तीन लंबी-लंबी अफवाहें

बाजार एक बार फिर 5400 से 5500 की रेंज तोड़कर नीचे चला गया। निफ्टी 5367 तक जा पहुंचा और मंदड़ियों की मौज हो गई है। वे आज तीन लंबी-लंबी अफवाहें फेंकने में कामयाब रहे। एक यह कि बीजेपी विकीलीक्स के ताजा खुलासे के बाद सरकार से सदन में बहुमत साबित करने की मांग करेगी, जिसकी कोई संभावना नहीं है। दो, जापान के फंड भारत से निकलना चाहते हैं जो फिर संभव नहीं है और इसे नोमुरा सिक्यूरिटीज की तरफ से स्पष्ट किया जा चुका है। और तीन, बजट पारित नहीं हो सकेगा। उनकी यह चाहत भी तार्किंक रूप से पूरी होती नहीं दिख रही। एसबीआई संशोधन विधेयक और पीएफआरडीए विधेयक कैबिनेट की हरी झंडी के बाद इसी सत्र में आसानी से पारित हो जाएंगी। फिर बजट में ऐसा कुछ नहीं जिसमें अडंगा डालने से विपक्ष का कोई हित सधता हो।

रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) को लेकर भी नकारात्मक बातें फैलाई गई हैं और इसका शेयर 4 फीसदी तक गिर गया। हकीकत यह है कि कंपनी ने कुछ दिन पहले ही पेट्रोलियम मंत्रालय को पत्र लिखकर कृष्णा गोदावरी बेसिन के डी-6 ब्लॉक से होनेवाले उत्पादन पर स्पष्टता की दरखास्त कर चुकी है। इस पत्र की खबर इसलिए बाहर लाई गई ताकि इस क्षेत्र की नियामक संस्था, डायरेक्टरेट-जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन्स (डीजीएच) से उसे जल्दी मंजूरी मिल सके और डी-6 ब्लॉक में यथाशीघ्र उत्पादन चालू हो सके।

इससे आरआईएल पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा, बल्कि जल्दी मंजूरी मिल गई तो उसका शेयर उछल सकता है। यह भी हकीकत है कि जब भी ट्रेडर इस स्टॉक में शॉर्ट होते हैं तो यह बहुत तेजी से बढ़ जाता है। बैंक ऑफ अमेरिका के बोर्ड में मुकेश अंबानी का शामिल होना कोई मामूली बात नहीं है। यह भारत के प्रति अमेरिका का कृतज्ञता-ज्ञापन है क्योंकि अमेरिका की नीतियां तय कराने में बैंक ऑफ अमेरिका का खासा प्रभाव वहां के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व पर पड़ता है।

मेरा मानना है कि आरआईएल इस साल केवल इसी वजह से दोगुना हो सकता है क्योंकि कुछ अमेरिकी निवेशक आरआईएल में इक्विटी हिस्सेदारी खरीदेंगे जो अब तक कभी नहीं हुआ है। उधर जापान को जी-7 से मिला समर्थन अपेक्षा के अनुरूप है। जापान अंततः अपने संकट पर काबू पाने जा रहा है और उसके बाद वहां के हालात में, अर्थव्यवस्था में बहुत तेजी से सुधार होगा।

बहुत से एफआईआई भारत में खरीदने की मुहिम में जुट गए और वे बड़े पैमाने पर खरीद या बड़े लॉट की तलाश में हैं। तमाम ब्रोकिंग हाउसों ने कंपनियों को अपग्रेड करना शुरू कर दिया है क्योंकि उनका वैल्यूएशन या मूल्यांकन एकदम नीचे तक जा पहुंचा है। एफआईआई ने अपनी बैलेंस शीट को साफ करने के लिए अनचाहे स्टॉक्स घाटा खाकर भी बेच दिए हैं जो ऐसे स्टॉक्स के भावों से जाहिर होता है। इस बात को किनारे रख दें तो यह भी हुआ है कि बहुत सारे रिटेल निवेशकों व एचएनआई ने साल के अंत के मद्देनजर ब्रोकरों के पास अपने खाते बंद करा दिए हैं।

अब सब कुछ बीत चुका है। इस वित्त वर्ष को खत्म होने में बस नौ कारोबारी सत्र बाकी हैं, जबकि पे-इन के दो दिन निकाल दें तो सात सत्र ही बचते हैं। अगले हफ्ते स्क्रीन देखकर फटाफट नफा-नुकसान बुक करने का सिलसिला चलेगा। बाजार अब अपने पैर टिका चुका है और इन नौ सत्रों में सब कुछ ठीक हो जाएगा। ये नौ सत्र सच्चे दीर्घकालिक निवेशकों के लिए खरीद का सुनहरा मौका बन सकते हैं।

मूर्ख दोस्त से ज्यादा खतरनाक कुछ नहीं होता। ऐसे दोस्त से तो बुद्धिमान दुश्मन ही भला।

(चमत्कार चक्री एक अनाम शख्सियत है। वह बाजार की रग-रग से वाकिफ है। लेकिन फालतू के कानूनी लफड़ों में नहीं उलझना चाहता। सलाह देना उसका काम है। लेकिन निवेश का निर्णय पूरी तरह आपका होगा और चक्री या अर्थकाम किसी भी सूरत में इसके लिए जिम्मेदार नहीं होगा। यह कॉलम मूलत: सीएनआई रिसर्च से लिया जा रहा है)

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