अवाम को मुफ्ती तो उद्योग को सब्सिडी!
कोई भी सरकार अगर सचमुच चाहती है कि देश की अर्थव्यवस्था बढ़े तो उसे धन को पूंजी में बदलने का काम करना चाहिए। लेकिन हमारी सरकार तो आर्थिक विकास के नाम पर दस साल से इवेंट और हेडलाइंस मैनेजमेंट में ही लगी है। वो अर्थव्यवस्था को भी राजनीति की तरह मैनेज करती है। जिस तरह उसने 81.35 करोड़ गरीबों को हर महीने पांच किलो मुफ्त अनाज और तमाम राज्यों की करोड़ों महिलाओं को लाडकी बहिन या लाडलीऔरऔर भी
श्रम के बिना तो पूंजी है ठनठन गोपाल!
पूंजी अगर श्रम को नियोजित न करे तो वह महज उपभोग का धन बनकर रह जाती है। मुकेश अंबानी के बेटे अनंत अंबानी की शादी में जो ₹5000 करोड़ खर्च हुए, वो अगर पूंजी के रूप में निवेश किए जाते तो समाज व अर्थव्यवस्था में मूल्य जोड़ते। लेकिन वो पूंजी महज भोग-विलास और दिखावे में स्वाहा हो गई। उस दौरान एकाध हज़ार लोगों को चार-पांच दिन का काम मिला होगा, लेकिन रोज़गार नहीं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमणऔरऔर भी
संकटकाल में निवेश करें किस कंपनी में
अर्थव्यवस्था की हालत डांवाडोल हो, सरकार के दावों पर यकीन न रह गया हो, विदेशी निवेशक भागे जा रहे हों, तमाम कंपनियों का धंधा मंदा चल रहा हो, शेयर बाज़ार गिरा जा रहा हो, तब ऐसा क्या पैमाना है जिसे निवेश लायक कंपनियां छांटने का आधार बनाया जा सकता है? यह है नियोजित पूंजी पर रिटर्न या RoCE, जिसे कंपनी के ब्याज व टैक्स से पहले के लाभ (EBIT) को नियोजित पूंजी से भाग देकर निकाला जाताऔरऔर भी
खतरे रिजर्व बैंक की स्वायत्तता टूटने के!
सरकार देश की सबसे बड़ी कर्जदार है और उसके कर्ज के इंतजाम का सारा ज़िम्मा रिजर्व बैंक का है। यह भारत सरकार और रिजर्व बैंक के बीच हितों का सबसे बड़ा टकराव है। इसे दूर करने के लिए तब के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वित्त वर्ष 2015-16 के बजट में सरकार के ऋण प्रबंधन के लिए एक स्वतंत्र पब्लिक डेट मैनेजमेंट एजेंसी (पीडीएमए) बनाने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन अप्रैल 2023 तक आते-आते पीडीएमए की यहऔरऔर भी






