उसने की तैयारी, ये देते ‘मित्र’ को बधाई
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के धन का भारतीय शेयर बाज़ार से निकलकर चीन के शेयर बाज़ार में जाने का सिलसिला रुकने के बजाय अब बढ़ सकता है। बीते हफ्ते शुक्रवार को ही चीन की सरकार ने अपनी सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए 10 लाख करोड़ युआन या 1.4 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की है। यह पैकेज कितना बड़ा है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि हमारी समूचीऔरऔर भी
भारत का नुकसान बना चीन का फायदा
शेयर बाज़ार और शेयरों के भाव धन के प्रवाह से चलते हैं। धन का प्रवाह लोगों के पास ज़रूरत के ऊपर इफरात धन से बनता है। इफरात धन खत्म तो शेयर बाज़ार भी खत्म। अब चूंकि वित्तीय जगत ग्लोबल हो गया है तो बेहतर रिटर्न की तलाश में दुनिया भर के लोगों का इफरात धन अच्छे अवसरों की खाक छानता फिरता है। ताज़ा उदाहरण है विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) का। जब तक उन्हें लगा कि उनका धनऔरऔर भी
न आशा ठीक, ना निराशा, केवल यथार्थ!
शेयर बाज़ार के निवेशक को न तो परम आशावादी होना चाहिए और न ही चरम निराशावादी। उसे दरअसल घनघोर यथार्थवादी होना चाहिए। आम सामाजिक व राजनीतिक जीवन में जिसे अवसरवादी होना भी कहते हैं। जैसी बहे बयार, पीठ तब तैसी दीजे। लेकिन अवसरवादी होने में नकारात्मकता है, जबकि यथार्थवादी होना सकारात्मक सोच है। जो जैसा है, उसे वैसा ही देखना और स्वीकार करना। शेयर बाज़ार उठता है, गिरता है। फिर उठ जाता है। यह उसका स्वभाव है।औरऔर भी
झूल गई है समृद्धि नारों के आसमान में
अमेरिका में ट्रम्प की जीत पर अपना शेयर बाज़ार ऐसा उछला जैसे इससे अर्थव्यवस्था में सुरखाब के पर लग गए हों। लेकिन अगले ही दिन सारा खुमार उतर गया। आईटी शेयरों की चमक भी फीकी पड़ गई। दुनिया जानती है कि ट्रम्प कुछ देता है तो उसके बदले में कहीं ज्यादा वसूल लेता है। यह भी कड़वी हकीकत है कि ट्रम्प के जीत से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारत में वापसी नहीं करने जा रहे। वे तो अर्थव्यवस्थाऔरऔर भी






