कंपनियां हों ऐसी जो चलें सदा के लिए!
क्या ऐसा हो सकता है कि बराबर कंपनियां छांटकर निवेश करने के बजाय हम एक बार ही 20-30 कंपनियों में निवेश कर दें और भूल जाएं। दस-बीस साल तक बराबर लाभांश पाते रहें और जब ज़रूरत पड़े तो 15-16% की सालाना चक्रवृद्धि दर के रिटर्न के साथ अपना धन निकालकर इस्तेमाल कर लें। लाभांश का चक्कर छोड़ दें तो हम निफ्टी-50 के ईटीएफ में एसआईपी से यह काम कर सकते हैं। साथ ही कुछ कंपनियों का दमखमऔरऔर भी
कौन आज़ाद हुआ? न पूंजी, न उद्योग!
वाणिज्य मंत्रालय से जुडे व्यापार उपचार महानिदेशालय (डीजीटीआर) ने सिफारिश की थी कि चीन से आयात हो रहे स्टील उत्पादों पर पांच सालों के लिए 18.95% काउंटरवेलिंग ड्यूटी (सीवीडी) लगा दी जाए ताकि घरेलू स्टील उद्योग को बचाया जा सके। लेकिन वित्त मंत्रालय ने इनकार कर दिया। उसका कहना है कि इससे भले ही देशी स्टील निर्माताओं को नुकसान हो, लेकिन स्टील उपभोक्ता भारतीय फर्मों को फायदा होगा। सवाल उठता है कि जब सारी दुनिया के देशऔरऔर भी
कौन आज़ाद हुआ? क्या स्वदेशी व श्रम!
यूपीआई का हल्ला। प्रधानमंत्री से लेकर वित्तमंत्री की वाह-वाही थम नहीं नहीं रहे। लेकिन यूपीआई में सबसे ज्यादा धंधा पेटीएम और गूगल-पे कर रहे हैं। पेटीएम स्वामित्व के लिहाज से अब चीनी कंपनी है, जबकि गूगल-पे पूरी तरह अमेरिकी है। क्रेडिट व डेबिट कार्ड के लिए स्वदेशी रूपे को लॉन्च किए हुए 11 साल हो चुके हैं। लेकिन अब भी अधिकांश कार्ड वीसा या मास्टरकार्ड हैं जो अमेरिकी कंपनियां हैं जिनके पास भारतीय उपभोक्ताओं की खरीद सेऔरऔर भी
कौन आज़ाद हुआ? न ज़मीन, ना जंगल!
अर्थव्यवस्था और उत्पादन के चार बुनियादी कारक हैं – ज़मीन, श्रम, पूंजी और उद्यमशीलता। उद्यमशीलता की अपने यहां कोई कमी नहीं है। अर्थव्यवस्था का अनौपचारिक या असंगठित क्षेत्र इसकी गवाही देता है, जहां देश का 94% से ज्यादा रोज़गार मिला हुआ है। नोटबंदी से पहले अर्थव्यवस्था में इसका योगदान 55-60% हुआ करता है जो जीएसटी जैसे कदमों से घटकर अब 15-20% रह गया है। लेकिन ज़मीन, श्रम व पूंजी की स्थिति दयनीय बनी हुई है। सब कुछऔरऔर भी






