अपने शेयर बाज़ार की कड़वी हकीकत यह है कि यहां कमाते कम और गंवाते ज्यादा हैं। जो शेयर बाज़ार के धंधे से सीधे जुड़े हैं, ब्रोकर या किसी अन्य बिचौलिये के रूप में, वे ज़रूर सदाबहार कमाई करते हैं। लेकिन बाकियों की हालत अक्सर खराब ही रहती है चाहे वो लम्बे समय के निवेशक हों या छोटी अवधि के ट्रेडर। ऐसे में सहज स्वाभाविक सवाल उठता है कि हमेशा ऊंच-नीच से गुजरते शेयर बाज़ार से कमाने कीऔरऔर भी

मुद्रास्फीति रोकने का ज़िम्मा रिजर्व बैंक का है। उसके पास इसे निभाने के लिए एकमात्र साधन मौद्रिक नीति है। ब्याज दर बढ़ाकर वह धन महंगा करता है, सीआरआर बढ़ाकर मुद्रा का प्रवाह कम करता है। लेकिन अपने यहां खाद्य वस्तुओं की महंगाई सरकारी नीतियों से बढ़ती है। कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव घटे। लेकिन केंद्र ने उसका लाभ उपभोक्ता तक पहुंचने नहीं दिया। एक्साइज़ बढ़ाकर उसने आठ साल में करीब 25 लाख करोड़ रुपए का टैक्स बजटऔरऔर भी

हमारे यहां दस साल पहले तक थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित मुद्रास्फीति प्रमुख थी। यह मुद्रास्फीति जून में 15.18% ऱही है। इसकी तुलना अमेरिका में प्रचलित प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI) आधारित मुद्रास्फीति से की जा सकती है जो जून में 9.1% और जुलाई में 8.5% है। साल 2012 से हम उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित मुद्रास्फीति पर आ गए। यह जून में 7.01% थी। लेकिन इसमें 45.86% योगदान खाने-पीने की चीजों का है। अकेले खानेऔरऔर भी

सिर पर चोट लगी हो तो आप घुटनों पर पट्टी नहीं बांधते। लेकिन अपने यहां भारतीय रिजर्व बैंक ऐसा ही कर रहा है। मुद्रास्फीति रोकने के लिए ब्याज दर बढ़ा देना अमेरिका जैसे विकसित देशों का सर्वमान्य तरीका है क्योंकि वहां धन सस्ता होने से लोग उधार पर लेकर जमकर खर्च करते हैं जिससे माल व सेवाओं की मांग बढ़ जाती है और सप्लाई सीमित होने के कारण मुद्रास्फीति या महंगाई बढ़ जाती है। इसलिए धन कोऔरऔर भी