आखिर शेयर बाज़ार में थोक व रिटेल भाव का कैसे पता लगाया जाए? व्यापार की तरह यहां कोई डिस्ट्रीब्यूटर या होलसेलर तो होता नहीं, जिससे माल थोक में खरीदकर फुटकर ग्राहकों पर बेच दिया जाए और कस्टमर को डिस्काउंट देने के बाद भी जमकर कमा लिया जाए! जाननेवाले जानते ही होंगे कि भरपूर डिस्काउंट देने के बाद भी डी-मार्ट (एवेन्यू सुपरमार्ट) कितना जमकर कमाता है, जिसके मालिक राधाकृष्ण दामाणी शेयर बाज़ार के भी बहुत पुराने उस्ताद हैंऔरऔर भी

जिसे भी शेयर बाज़ार का सफल ट्रेडर बनना है, उसे सबसे पहले व्यापारी की सूझ-बूझ और धंधे का बुनियादी तौर-तरीका सीखना होगा। सीखना ही नहीं, बल्कि उसे आत्मसात करना होगा, अपने जेहन में गहरे बैठाना होगा। कोई भी व्यापारी थोक के भाव में खरीदता और रिटेल के भाल पर बेचता है। इसी मार्जिन से वह अपनी दुकान के रखरखाव व कर्मचारियों का सारा खर्च निकालने के बाद मुनाफा कमाता है। यह मुनाफा इतना होता है कि अपनाऔरऔर भी

महंगाई क्यों बढ़ी या घटी, व्यापारी इस चक्कर में कभी पड़ता ही नहीं है। उसे इतना भर पता होता है कि अभी चल क्या रहा है। इसी तरह शेयर बाज़ार के ट्रेडर को कभी इस पर मगज़मारी करनी ही नहीं चाहिए कि ऐसा क्यों या वैसा क्यों है। उसे तो बारीकी से यह जानना चाहिए कि अभी, ठीक इस वक्त बाज़ार में चल क्या रहा है। इसके लिए उसे माइक्रोस्कोप लगाना पड़े या टेलिस्कोप, सब चलेगा। लेकिनऔरऔर भी

जिस तरह घोड़े पर अच्छी सवारी करने के लिए उससे जान-पहचान और दोस्ती बनानी पड़ती है, उसी तरह हमें जिन शेयरों में ट्रेड करना है, उसका स्वभाव समझना पड़ता है, उससे अच्छी जान-पहचान बनानी पड़ती है। तभी हम सही मौके पर उन्हें खरीद और बेचकर ट्रेडिंग से मुनाफा कमा सकते हैं। शेयरों का स्वभाव उसमें सक्रिय ट्रेडरों व निवेशकों की प्रवृत्ति से बनता है। कुछ शेयर अच्छे होते हैं, लेकिन लम्बे समय तक चलते ही नहीं। इसलिएऔरऔर भी

रिस्क बहुत ज्यादा हो तो इंसान को निराशावादी हो जाना चाहिए और रिस्क काफी कम हो तो आशावादी। जबरदस्त रिस्क के माहौल में आशावाद हमारी नैया डुबा सकता है, जबकि निराशावाद से घिरे होने के कारण हम बहुत-बहुत फूंक-फूंककर सावधानी से चलेंगे तो बचने की गुंजाइश भरपूर रहेगी। वहीं, रिस्क बहुत कम हो तो आशावाद से लबालब होकर हम सुरक्षित फैसले ले सकते हैं, जबकि निराशावाद में डूबने पर अच्छे-खासे सुरक्षित मौके भी हमारे हाथ से निकलऔरऔर भी